आओ हम भी आरक्षण की तलवार उठाते हैं

देश आगे बढ़ने को उद्यत, हम खुद को पिछड़ा बताते हैं 
खुद के आशियाने को चमकाने को लोगों के जीवन जलाते हैं
गुर्जर, पटेल और जाट बंधुओं का चलो समर्थन पाते हैं 
आओ हम भी आरक्षण की तलवार उठाते हैं 

यहाँ जला, वहां मार काट, कही जाम की लाठी दिखाते हैं
जीवन की बुनियादी सुविधाओं को रोक हठ धर्म निभाते हैं 
जन साधारण को दहशत में ला खुद को विजयी ठहराते हैं
आओ हम भी आरक्षण की तलवार उठाते हैं 

गरीब, विकलांग, अनाथ बच्चों के हक़ छीन ले जाते हैं
हम दबंग अपने महलों की शान में पिछड़ा वर्ग लिखवाते हैं
अपने बच्चों को खुद ही कमतर आंक कर आते हैं 
आओ हम भी आरक्षण की तलवार उठाते हैं


१९४९ में संविधान ने कहा चलो पिछड़ों को आगे लाते हैं

आज ६६ साल बाद अग्रणी वर्ग पिछड़ा कहलाने को जोर लगते हैं
क्यों आरक्षण, किसे आरक्षण – इस बात पे भी मिटटी पाते हैं
आओ हम भी आरक्षण की तलवार उठाते हैं

जो दिख गया नज़र के सामने, उस निर्दोष की बलि चढाते हैं 
हमारे जोश में पकड़ा गया वही, इसकी सजा सुनाते हैं
कौन साथ वो सगा हमारा, यही धुन गुनगुनाते हैं
आओ हम भी आरक्षण की तलवार उठाते हैं 

अपने लक्ष्य पाने को क्यूँ प्रतिभा मांजे अपनी
आरक्षण की बैशाखी पे खुद की पताका लहराते हैं
आरक्षण की मांग में देश की होली जलने का त्यौहार मानते हैं

आओ हम भी आरक्षण की तलवार उठाते हैं

अर्चना

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Its NOW or NEVER!!

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