हे मालिक! पुत्रों में यह अंतर तूने

हे मालिक! पुत्रों में यह अंतर तूने क्यूँ किया?

हे मालिक! पुत्रों में यह अंतर तूने क्यूँ किया?
किसी को अपंग  बनाया, किसी को बेघर कर दिया|
उस मासूम बच्चे का क्या कसूर, जिसे तूने गरीबों के घर भेजा
क्या इस पक्षपात से नही पसीजा तेरा कलेजा?
क्यूँ बनाया तूने किसी को जानवर, तो किसी को आदम बनाया?
किसी को काँटों में झोंका, किसी को फूलों पर लिटाया|
गोरे काले बनाने में तेरा मकसद क्या रहा होगा?
इस भेदभाव से किसका क्या भला होगा?
अंगों से गरीब बनाने का जिम्मेदार है तू
आधी मूर्ति बनाई, कैसा कुम्हार है तू?
उपेक्षित वर्ग का कष्ट देख  करभी चुप क्यूँ है तू परमपिता?
तेरे कारण यह अभागा, स्वार्थी समाज की चक्की में पिसा
कर कुछ ऐसा की पक्षपात बंद हो सके,
ताकिभारतीय समाज फिर स्वछंद  होसके||