यात्रा और सहयात्री


चलो एक संस्मरण सुनाता हूँ तुम्हें
. ठीक से ज्यादा कुछ याद नहीं पर जो भी याहै, बताता हूँ.
एक दफे की बात है, मैं कहीं ट्रेन से सफ़र कर रहा था. कम्पार्टमेंट में, बेशक, मेरे साथ कुछ और हमसफर भी थे. उनमें एक लड़की भी थी. वो सफ़र बड़ा हसीन और यादगार था. उसमें कई लोग मिले, कुछ से घुलमिल गया, दोस्ती हो गयी. कुछ से नहीं हुई, अधिक लोगों की सोहबत से मुझे यूँ भी परेशानी ही होती है; खैर, जो भी था, अच्छा था.
चलो अब उस लड़की के बारे में कुछ बताता हूँ . शक्ल ठीक थी, पर नाक थोड़ी मोटी थी, शायद ये उसे उसकी माँ से विरासत में मिली थी. वह हँसमुख थी, ऊँचाई औसत थी, रंग साफ़ था, बाल घुंघराले और मोटे फ्रेम का चश्मा पहने हुई थी. आवाज़ साफ़ थी पर बड़े धीमे बोलती थी, मेरे जैसे ऊँचा सुनने वाले को बड़ी तकलीफ होती थी. वो बेबाक थी, पर बेशर्म नहीं. इन दोनों शब्दों में मामूली सा पर बड़ा अंतर होता है. जब कोई डॉक्टर मरीज़ को उसकी बीमारी के बारे में साफ़ बताता है तो वो बेबाक होता है पर अगर वो उसकी जिजीविषा नष्ट कर दे तो वो बेशर्मी होती है. बेबाकी में  प्रौढ़ मानसिकता मर्यादित होती है, बेशर्मी में अश्लीलता होती है.
उसकी एक और आदत थी कि वह रात भर जागा करती थी, शायद निशाचर थी या चाँद की संगिनी. इसीलिए जब भी उसे देखा, ऐसा लगा जैसे वो अंगड़ाई ले रही हो, ऊंघ रही हो.
उसके साहचर्य की अनोखी बात यह भी थी कि उससे बात करते कई बार मेरे मुख से भी बहुत सुन्दर बातें अनायास निकल पड़ी, शायद ही कभी ऐसा हुआ हो मेरे साथ की किसी का यह प्रभाव पड़ा हो और कभी तो वो भी निष्कामभाव जैसे बड़ेबड़े दर्शनों की बातें करती थी.
 
दुनिया में हजारों रिश्ते होते हैं, परिवार के, प्रेमी के, दोस्ती के, रिश्तेदारों के, गुरुशिष्य के, पर इन सब में गुमनामी में जीनेवाला रिश्ता है हमसफर का. उसमें रिश्ते की कोई बंदिश नहीं होती. कोई रिश्ता कितना भी प्यारा क्यों ना हो, उसमें कितना भी प्यार क्यों ना हो, शिकायतें और नाराज़गी उसका हिस्सा ज़रूर होती हैं. कभी दोस्तों से खफगी होती है कभी मातापिता से या कभी भाईबहनों से. हम कभी इनका इज़हार करते हैं, कभी नहीं करते. कभी खुद को मना लेते हैं, या कभी रूठ जाते हैं. पर सहयात्री का सम्बन्ध इन सबसे परे है. जिससे जो भी शिकायत  हो, ज़िन्दगी का कोई भी वाकया उसको सुना देते हैं. जो बातें हमने कभी अपने सगों से नहीं कही हो, उसको बता देते हैं. उसमें विश्वास होता है. हम यह नहीं सोचते कि यह जानकार उसके मन में क्या ख्याल आएगा, क्योंकि सहयात्री का सम्बन्ध, छवि से ऊपर उठा होता है. दो सहयात्री कभी एकदुसरे की बात का बुरा नहीं मानते. उसमें समझदारी होती है. यही समझदारी उसमें झलकती थी, तभी तो मैंने कहा कि वो बुद्धिमती और प्रज्ञ थी.  
  
मैं क्या बोलूं, मैं तो उसे ठीक से जान भी नहीं पाया, सफ़र ही कुछ ऐसा था; या फिर यूँ कह लें कि हमारा रिश्ता हिंदुस्तानअमरीका जैसा था. जब यहाँ दिन, वहाँ रात; यहाँ रात तो वहाँ दिन. सफ़र में साथ गुज़ारने को बहुत कम वक्त मिला; ये शायद प्रकृति का दोष था या किसी और का या संयोगमात्र था. पर वो लड़की उन चुनिन्दा लोगों में से है जिनकी ख़ुशी में शामिल होने से मैं भी आनंदित होता था. मैं कला का अच्छा पारखी नहीं हूँ. मुझे नहीं पता कि वो कैसी नृत्यांगना थी पर इतना मैं अवश्य कह सकता हूँ कि जब मैंने उसे ख़ुशी से झूमते देखा था, तब मेरा मन भी आह्लादित हुआ था.
  
उसकी एक अनोखी आदत थी, अगर उसको कुछ बोलता तो वो पलट कर उस बात को किसी और या फिर मेरे ही ऊपर डाल देती. अपनी प्रशंसा से कोई परहेज हो जैसे, या किसी बात का इकरार करने से शर्म. पता नहीं वो कैसी असहजता महसूस करती थी. अगर किसी बात पर खिंचाई करता तो पलट कर बात मुझ पर डाल देती. उसकी चंचलता का परिचायक, यह मनोरंजक उपहास बहुत सुन्दर हुआ करता था.
  
उसे साहित्य में बड़ी रूचि थी. संभवतः उसके मित्रों में कुछ लेखक भी थे, और शायद मेरी कवितायें भी उसे पसंद आयीं थी, ख़ास तौर से उनमें प्रयुक्त विरोधाभास, पर मेरे अंग्रेजी के गद्य उसे हमेशा नीरस ही लगे.
उसकी हाज़िरजवाबी भी काबिलतारीफ थी. उसके जवाब आसानी से हाज़िर नहीं होते थे, कई बार तो मैं खुद भूल जाता था कि कुछ कहा हो उसको. पर हाँ, उसके देर आए दुरुस्त आएजैसे जवाब, उसकी वाक्पटुता और ओजस्वी विवेक का परिचय देते थे. कई बार तो वो मेरी बात का जवाब देती तो माफीनामे से शुरुआत करती, शायद उसे पता नहीं था कि वह कभी मुझे रुष्ट नहीं कर सकती, हमारा रिश्ता ही ठेसमुक्त था.
 
तो क्या वो दोस्ती थी? नहीं, दोस्ती तो वो तब होती जब हमारे बीच कई और कड़ियाँ होती या हमारा साहचर्य लम्बा होता. हमारा तो एकदुसरे पर अधिकार था पर फिर भी हम बेहक थे. अगर वो दोस्ती होती तो मुझे उसकी पृष्ठभूमि का ज्ञान होता, पर मैंने न कभी कुछ जाना, न जानना चाहा, न जानने की ज़रूरत महसूस हुई और न ही जाननेनहीं जानने से कोई फर्क पड़ा. मुझे तो बस इतना मालूम था कि उसके पिता सेना में कार्यरत थे और उसकी पैदाईश हैदराबाद में हुई थी. सो वो बस एक छोटे से रास्ते के अनजान हमसफ़र का रिश्ता था. मैं कोई तुलना नहीं कर रहा बस एक पैमाना तैयार कर रहा हूँ, जो हर किसी में फर्क बता रहा है. ये फर्क दो को अलग करके भेद पैदा करने वाला नहीं है. ये तो वैसा है जो हर किसी की एहमियत बयां करता है, जैसे नासिका नयनों को अलग करके चेहरे कि खूबसूरती बढ़ाती है. भले मुझे भी ऐसे रिश्ते का कोई अनुभव नहीं था पर यह नया रिश्ता फिर भी सुन्दर और प्यारा था. यह विचार मन में कई बार आता है कि ये यादें हमेशा मेरे साथ रहेंगी, पर तभी दूसरा सवाल उठ खड़ा होता है, क्या ये बस यादें ही रह जाएंगी ?
  
तभी ये जवाब आता है कहीं से कि, हाँ, ये बस यादें ही रह जाएंगी. जब हमारी मुलाक़ात हुई थी तब वो ऐसी थी मानो जैसे ऋषिकेश की गंगा; अल्हड़, कुशाग्र, निर्मल, उग्रवेग वाली और उच्छृंखल. मैं तो केवल उसकी कुछ बूँदें एक पात्र में कैद करके स्मृतिचिह्न तौर पर ही साथ रख सकता हूँ. मुझे नहीं मालूम की आगे कभी हमारी भेंट होगी या नहीं, पर अगर होगी, तो मैं उस गंगा को उतना विशाल देखना चाहूँगा जैसा मैंने बचपन में पाटलिपुत्र में देखा था, उतनी ही निर्मल जैसा कभी सम्राट अशोक ने देखा होगा और ऐसी करुणामयी कि शूरवीर समुद्रगुप्त की तलवार को स्वच्छ कर दे. वहाँ न तो पहाड़ है, न ही पठार, वेग तो मद्धम होगा ही, पर उसकी महत्ता वही रहे, यही मेरी अभिलाषा है. पर जो गाद वो ऋषिकेश से लेकर चली थी उसे मैं पाटलिपुत्र के मैदान में देखना चाहूँगा, वही तो उसका अस्तित्व है. यह तो संयोगमात्र था कि हम मिले, पर आगे नए रास्ते फूटते हैं, हमारे रास्ते अलग होते हैं. विदाई की बेला तो आनी ही थी और ये बस यादें ही रह जाएंगी. वैसे तो चाँद हर रात खिलता ही रहेगा, उसकी संगिनी भी वहीं कहीं रहेगी, दिख ही जाएगी.
  
तो अब मुद्दा यह उठता है कि अगर फिर वो रिश्ता ख़ास क्यों है? ये रिश्ता ख़ास इसीलिए है क्योंकि  यात्रा के आरंभ से अंत तक  हमारा साथ था. वो उन सहयात्रियों में थी जिनसे मेरा सबसे पहले परिचय हुआ था, और बिना किसी नोंकझोंक के सफ़र कट गया. ख़ास इसीलिए था कि मुझे उसके आगे कभी हिचकिचाहट महसूस नहीं हुई, उससे ज्यादा प्रभावित मैं शायद ही किसी से उस दिन से पहले हुआ था.  ख़ास इसलिए कि मुझे कभी भी उसकी बात की जिरह करने कि ज़रूरत महसूस नहीं हुई. ख़ास इसलिए भी कि मैंने जितनी बौद्धिकचर्चाएँ और वादविवाद उसके साथ किए हैं, शायद ही किसी और के साथ किए हों.

अब आखिरी में एक बड़ी सच्चाई बताता हूँ, जो मैंने अभी तक बताया वह बस एक स्वप्न था, यथार्थ से परे, तभी अस्तित्वहीन और मीठा था; और यह भी एक सच्चाई है कि मैं नहीं चाहता कि इसका कोई भी हिस्सा कभी सच्चाई बनकर मेरे सामने उतरे, क्योंकि संसार कि हर सच्चाई के साथ मैं उम्मीदें बाँध लेता हूँ, और फिर यह सम्बन्ध तो बंधनमुक्त था.

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