"जो चौका उढ़ते हुए जाय उसे छक्का कहते

“जो चौका उढ़ते हुए जाय उसे छक्का कहते हैं”

हर कोई स्त्री हो या पुरुष, कभी न कभी इन लोगों के सम्पर्क में अवश्य आये होंगे, और तो और उनसे मिल के थोडा चकित, हैरान, गंभीर, परेशान अवश्य हुए होंगे। वो आपसे रूपये मांग रहे होंगे, बिना हाथ जोड़े और बात बात पे तालियाँ बजा रहे होंगे, तालियाँ बजाने का लहजा कुछ हट के होगा और आप इस दुविधा में होंगे कि इन्हें स्त्री कहूँ या पुरुष। तभी आपको ख्याल आएगा ‘तीसरे लिंग’ का जो न स्त्रीलिंग हैं न पुलिंग, अक्सर इन्हें लोग ‘बीच का’ या ‘छक्का’ कहते हैं और ये ‘हिज़ड़े’ के नाम से पूरी दुनिया में जाने पहचाने जाते हैं।
हिन्दू धर्म ग्रन्थो में इनका उल्लेख मिलता हैं। कहा जाता हैं कि भगवान श्री राम ने इनको एक वरदान दिया कि ख़ुशी के मौकों जैसे कि शादी, जन्मदिन का अवसर पर इनके द्वारा दिया आशीर्वाद भलीभुत होगा। तभी से ये शादियों और जन्मदिन के मौकों पर पहुँच कर ढोल बाजा लेकर गीत गाते हैं और डांस करते हैं साथ ही परिवार को आशीर्वाद देते हैं और बदले में लोग ख़ुशी से इन्हें भेंट या रूपये देते हैं।
किन्तु आज कल हिज़ड़े बिना किसी ख़ुशी के अवसर पर लोगों के घर घुस जाते हैं, ट्रेन या बस में चढ़ जाते हैं और लोगों से जबरदस्ती रूपये मांगने लगते हैं और जब कोई रूपये नहीं देता हैं तो उससे बदतमीजी करने पर उतारू हो जाते हैं और तो और आजकल इनके आशीर्वाद की कीमत लाखों में पहुँच गयी हैं, जब तक मनचाहा पैसा इन्हें नहीं मिलता ये चल रहे समारोह से जाने का नाम ही नहीं लेती हैं और माहौल बिगाड़ने का कोई मौका नहीं छोड़ती। ये मेरी अपनी व्यक्तिगत राय हो सकती हैं पर पिछले 10 सालों में, मैं जब भी हिज़ड़ों से टकराया मेरा अनुभव अच्छा नहीं रहा, इन हिज़ड़ों के व्यवहार, आचरण और हरकतों ने मुझे मेरी ऐसी राय के लिए प्रेरित किया। मैं चाहूँगा कि कभी कंही ऐसा मौका मिले और मेरी इस राय में थोडा बदलाव आये। चंद हिज़ड़ों की ज़मात ने समस्त हिज़ड़ों के प्रति मेरा नजरिया संकुचित कर दिया हैं।
हाल ही का एक वाकिया मैं आपको बताता हूँ फिर आप को अगर लगे कि मैं गलत हूँ और हिज़ड़े उचित तो आप मुझे सुधरने  के लिए कह सकते हैं। तो हुआ यूँ था मैं दिल्ली से नैनीताल के लिए बस से जा रहा था पर रामपुर के पास कोई दुर्घटना हुयी थी, सड़के जाम थी, ऊपर से सडक ‘वन-वे’ थी। 6 घंटे से ज्यादा बीत चूका था एक किलोमीटर भी नहीं पार हुआ था। रात के 9 बजे के चले हुए, सुबह के 6 बजे थे और हम रामपुर की गलियों में घसीटते हुए ख़िसक रहे थे। हम सभी नींद में कुर्सी में बैठे बैठे खुद को कोस रहे थे कि किस घड़ी में बस से आना हुआ इससे अच्छा नहीं आता। तभी अचानक दो हिज़ड़े बस में चढ़ गए और लोगों से रूपये मांगने लगे, जिनके पास खुले रूपये नहीं थे उन्हें मजबूरीवश 100 रूपये देने पड़े और जो नहीं दे रहा था उसकी गोद में वो बैठ जाते और जब तक रूपये नहीं मिलते नहीं उठते, कोई जब पैसे निकालने को अपना बटुआ निकालता तो ये हिजड़े ज़बरदस्ती उससे उनका बटुआ छिन लेते और 100, 500 जो बनता ले लेते। हद तो तब हो गयी जब किसी ने 20 रूपये देने चाहे तो ये कहने लगे- “100 रूपये से कम नहीं लेंगीं हम ” और जब कोई मना करता तो उसके गुप्तांगों  को अपने हाथों से पकड़ने लगती, और ताली बजाते रहती और बोलती “चल दे न, चल दे न” और जब दे देता तो आशीर्वाद देते हुए कहती “खुश रहे तू, बड़ा पैसा कमाए”
तभी एक हिज़डा मेरे पास आ पंहुचा, मेरे पास टिकट के बाद बचे 20 रूपये थे, तो मैंने 10 का नोट आगे बड़ा दिया, वो गुस्से से मुझे देखने लगीं और बोली “भिखारी नहीं हैं हम, 10 नहीं 100 रूपये निकाल”, मैंने फिर 20 रूपये आगे बढा दिया, ये देख वो गुस्से से मेरे गुप्तांगों को पकड़ने और  लगी, वो तो अच्छा हुआ मैंने जीन्स पहनी हुयी थी ..। मैंने कहा “लेना हैं तो 20 लो” इस पर वो ताव मैं आ गयी और बोली “नहीं लूंगी तो क्या कर लेगा, चल 100 रूपये निकाल”, मैं चुप था मेरे बगल मैं बैठा बन्दा भी 20 रूपये निकल के देने लगा, ये देख वो बोली “दिखाऊ क्या ? तुम ऐसे नहीं मानोगे” ये कहते हुए वो अपनी सलवार का नाड़ा खोलने लगीं। मैंने कहा “अरे 20 रूपये ख़ुशी से दे तो रहे हैं अब क्या?” पर उस पर जूँ तक नहीं रेंगी वो अपनी ब्लाव्ज़ खोल चुकी थी और सलवार नीचे खिसकने लगी। मैंने मुँह दूसरी तरफ फेर लिया। वो हिज़डा पूरा नंगा मेरे सामने था। सब हैरान थे, बस में सन्नाटा पसर गया, सब चुप। बस में कई बच्चे, बूड़े, शादी-शुदा लोग और कई लड़के-लडकियाँ थे। उस हिज़ड़े को ज़रा भी शर्म नहीं आई, 100 रूपये के लिए वो अपना मजाक बनाने को तैयार थी।
अब अपनी सलवार को बांधते हुए बोली ” चल अब निकाल” मैंने 20  रूपये आगे बढ़ाते हुए कहा “लेना हैं तो ये लो और नहीं हैं”. उसे लगा मेरा ये ब्रह्मास्त्र का तो इस पर कोई असर नहीं हुआ तो वो कहने लगी “क्यों ले रहा हैं हमारी ‘हाय’ ?” मैंने कहा “‘हाय’ लेने वाला ऐसा कोई काम ही नहीं किया, मेरे माँ-बाप की दुवाओं के सामने तेरी हाय मेरा कुछ नहीं कर सकती ” ये सुन उसने मेरी छाती में बड़ी तेज़ थप्पड़ जड़ दिया और मेरे हाथ से 20 रूपये भी छीन कर आगे बढ गयी। मेरे पीछे बैठे लोग सकते में आ गए थे और शीघ्र ही बिना कहे 100 रूपये देने लगे।
जब उनके पास लगभग 4000 रूपये हो गए वो बस से उतर गए। उनके बस से उतरने के बाद बहस छिड़ गयी और लोग इसे उनकी ज़बरदस्ती, गुंडागर्दी बताने लगे, मैंने भी हां में सर हिला दिया। पर इस गुंडागर्दी को बढावा आप ही दे रहे थे उनके कहे अनुसार 100 रूपये फटाफट दे रहे थे, कोई भी विरोध में नहीं खड़ा हुआ। कहते हैं न अन्याय को सहने वाला भी उतना ही दोषी हैं जितना उसको करने वाला।
अब आप ही कहे बस मैं कौन सा ऐसा उत्सव था कि लोग उन्हें हज़ार के नोट देते, न ही किसी का बस में जन्मदिन ही था? सब बस में बैठे बैठे ट्रैफिक-जाम से परेशान थे, तभी ये वाक्या हो जाता हैं। मैं पिताजी से मिलने घर जा रहा था, उनका एक्सीडेंट हुआ था, तो किस बात के 100 रूपये उनको दे देता। कई ऐसे लोग होंगे जो मजबूरी में कंही जा रहे होंगे, न जाने क्या समस्या होंगी उनकी पर ये हिजड़े इससे बेपरवाह अपनी कमायी करने के तरीके इजाद कर रहे हैं और उसके लिए ज़बरदस्ती, बदतमीजी पे उतारू हैं।
अब आप ही बताये क्या ऐसे वर्ग को जिन्हें स्वयं श्री राम से आशीर्वाद मिला हो, जो पार्वती-शिव के अर्धनारीश्वर रूप को पूजते हो, ऐसे कृत करना शोभा देता हैं ? नहीं। अखबारों में कई ऐसी खबरे आती हैं कि कई विकृत सोच के लोग हिज़ड़ों की कमाई देख बच्चो का अपहरण कर उन्हें हिज़डा बना रहे हैं और इसे भी एक धंधा बना रहे हैं, कई डॉक्टर इस मामले में पकडे गए हैं। कुछ तो गड़बड़ हैं, कोई आश्चर्य नहीं क्यों इनकी संख्या इतनी बढ़ रही हैं। हिज़ड़े वर्ग के अधिकारियों को समाज में फैलती इस तरह की गन्दगी की सफाई के लिए कदम उठाने चाहिए, तभी लोग ख़ुशी ख़ुशी इन्हें ख़ुशी के मौको पर बुलाएँगे।
इन हिज़ड़ों को किसने बस या ट्रेन लूटने का अधिकार दे दिया, किसने इन्हें लोगों से ज़बरदस्ती का अधिकार दे दिया। कब तक लोग इनकी हाय से डरेंगे ? यदि ऐसा ही चलता रहा तो वो दिन दूर नहीं जब इन चक्कों से निपटने के लिए लोग बैट निकाल लिया करेंगे।
प्रेरणा : “न तू स्त्री बनेगा न पुरुष बनेगा, तू तो दोनों के बीच की कड़ी बनेगा।”