उत्तराखंड की त्रासदी के गुनाहगार कौन

उत्तराखंड की त्रासदी के गुनाहगार कौन ?

                   उत्तराखंड, जिसे देवभूमि के नाम से भी जाना जाता हैं, जहाँ चार धाम विराजते हैं और जो राज्य  धार्मिक आस्थाओं पर टिका हैं, आज अपने इधर उधर बिखरे  निशान बटोरने को विवश हैं। मानसून की पहली फुहार से केदारनाथ, रामपाढा,  देवप्रयाग, गंगोत्री, हेमकुण्ड, चमोली, गौरीकुण्ड में जो कुछ हुआ वो किसी प्रलय से कम नहीं। इस त्रासदी ने उत्तराखंड के कई छोटे-छोटे कुल मिलाकर 25 से भी ज्यादा गाँवों को मिटा दिया, वहां रह रहे लाखों स्थानीय लोगों को बेघर, बर्बाद कर दिया हैं, अब उनके पास पहाड़ों, गंगा की कल-कल करती आवाज के सिवा कुछ नहीं बचा। हजारों लोग इस घटनाचक्र बादल फटना, दो दिनों से आती तेज़ बारिश, बाढ़ आना, पहाड़ो से भारी भूस्खलन होना और फिर गंगा का तूफानी वेग में बहाव जैसे महादेव ने अपनी जटाओं से गंगा को मुक्त कर दिया हो और गंगा अपनी सदियों की पीड़ा को बाहर निकाल रही हो, और फिर सड़कों का आँखों से पल भर में सरक कर गंगा में समां जाना, के कारण काल के गर्त में समां गए तो वहीँ खुश किस्मत लाखों लोग अपनी जान बचाने में सफल रहे। लोग जगह-जगह पहाड़ की कंदराओं में, पहाड़ों की वादियों में, गंगा के पास, एक तरफ खायी तो दूसरी तरफ भूस्खलन के बीच फंसे रहे। परन्तु एक आस कि सरकार शीघ्र उन्हें बचायेगी और सुरक्षित स्थान में ले जायेगी, ने उनकी साँसों को थामे रखा।
तबाही के बाद केदारनाथ 
               परन्तु ये बेहद दुखद हैं कि अभी भी लोग राहत पहुचने का इंतज़ार कर रहे हैं, सेना के जवान कैसे बिना रास्तों के शीघ्र राहत पंहुचा सकते हैं, ये सब जान कर भी सरकार मदद के लिए पर्याप्त  हैलिकॉप्टरों का प्रबंध नहीं कर पायी। माना सरकार किसी भी विपदा से निपटने के लिए तैयार नहीं हैं परन्तु विपदा के बाद भी राहत के कार्यों में इतना गैर जिम्मेदाराना रवैया एक अयोग्य सरकार की निशानी हैं। लोग यहाँ वहाँ लाशों में पड़े हैं, तो वहीँ लोग अपनी जान को बचाने के लिए एक राह ढूढ़ रहे हैं, उसी दौरान न जाने क्या सोच प्रधानमंत्री हवाई सैर पर उत्तराखंड आते हैं और वादियों के नजारों  का लुफ्त लेने  के बाद लौट जाते हैं। कैसा ज़मीर हैं इन शासकों का कि दूसरे की तड़प और दर्द से इनका कोई सरोकार नहीं?
                मौसम विभाग की जानकारी के अनुसार कदम न उठाना, विपदा से निपटने की पूर्ण जागरूकता न होना, आपदा प्रबंधन का अपनी जिम्मेदारी से मुहँ मोड़ना और एक्शन के लिए किसी विपदा का इंतज़ार करना, पर्यावर्णविद की सलाह को नज़र अंदाज़ करना और अँधाधुंध बांधों का निर्माण करना, गंगा का मार्ग बदलकर उन्हें सुरंगों से गुजारना और सबसे बड़ा और महत्त्वपूर्ण राज्य के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री का विपदा की गंभीरता को न समझना, ऐसे कारण हैं जिसकी वजह से आज एक सप्ताह बाद भी करीब 22 हज़ार लोग उत्तराखण्ड में कठिन हालातों में फँसे हैं और अपनी घर वापसी का इंतज़ार बड़े सब्र के साथ कर रहे हैं। वो तो शुक्रिया सेना के जवानों का जिन्होंने दिन रात राहत कार्य में खुद को झोंक दिया और लोगों को खोज खोज कर दुर्गम जगहों से निकाल कर सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया।
              कठिन हालातों में ही मनुष्य का असली चेहरा दिखता हैं, जहाँ स्थानीय लोगों ने प्रभावित पर्यटकों और राहगीरों की मदद के लिए हर संभव प्रयास किया और उन्हें संभाला वो सराहनीय हैं, परन्तु वहीँ कुछ लोग इन हालातों में भी अपनी क्रूरता नहीं छोड़ते, मदद के लिए आगे नहीं आते और ऐसे हालातों का नाजायज फायदा उठाते हैं, ऐसे लोग संख्या में कम ही हो पर मानवता के नाम पर कलंक हैं, ऐसे लोगों को शायद इंसानियत, पुण्य और दर्द का अहसास नहीं।
           उत्तराखंड में फंसे पर्यटक तो अपने घर सुरक्षित लौट जायेंगे, लेकिन सोचो उनका क्या जिन्होंने इस आंधी में अपने खो दिए, उन स्थानीय लोगों का क्या जिन्होंने अपना घर, अपना सब कुछ खो दिया? उनकी दुनिया तो फिर वहीँ से अगली सुबह का इंतज़ार करेगी। आज पूरे देश के लोगों का ध्यान आज उत्तराखण्ड की तरफ हैं, ये सराहनीय हे कि सभी देशवासी पीड़ितों की मदद के लिए आगे आ रहे हैं
             ये पहली बार नहीं हुआ कि देवप्रयाग या रुद्रप्रयाग में बादल फटा हो, ये पहली बार नहीं था कि वहाँ इतनी तेज़ बारिश हुयी हो, ये पहली बार नहीं था कि भूस्खलन हुआ हो, ये पहली बार नहीं था कि गंगा इतनी तेज़ बहाव में बही हो, तो क्या था ऐसा जिसके कारण इतना कुछ हो गया? थोड़ा आत्ममंथन करने की ज़रुरत हैं कारण स्वयं रूबरू हो जायेंगे। ये सभी कारण मानवीय हैं; इसे गंगा, जो हर आत्मा को तृप्ति प्रदान करती हैं, का दोष न माना जाय, न ही दोष इन हसीं वादियों, जो गंगा को एक दिशा देते हैं ताकि वो दिशाहीन हो कर न बहे, का हैं जिसने न जाने कितने लोगों को पनाह दी। 
            ये पहाड़ों में होते निर्माण कार्य, पेड़ों का कटान, पर्वतों में सुरंग बना कर उन्हें कमजोर करना, निर्माणाधीन 30 बांधों का होना, न जाने क्या क्या विकास के नाम पर पर्वतों की मूल पहचान से उसे जुदा करने की कोशिश ने ही इस विपदा को जन्म दिया और इसकी कीमत लाखों लोगों को चुकानी पड़ी। पर्वतीय राज्यों का  मुख्यमन्त्री पहाड़ों का एक निवासी ही होना चाहिए, पहाड़ों की समस्या, और उनकी हलचल को  केवल एक पहाड़ी ही समझ सकता हैं। कमी आपदा प्रबंधन में ही नहीं, अपितु अयोग्य को ऐसी जिम्मेदारी देने में भी हैं। 
           कहते हैं न शक्ति मिलने पर जिम्मेदारी भी मिलती हैं, परन्तु देश के नेता, अधिकारी केवल शक्ति का दुरूपयोग करने में ही मशगूल हैं। कब लोग अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से लेंगे?  क्यों ऐसा होता हैं कि किसी त्रासदी के बाद ही सब हरकत में आते हैं? और फिर एक महीने बाद सब भूल जाते हैं? कितना कुछ इस प्रकृति ने दिया हैं हमें पर आज हम उसी का अंधाधुंध दोहन करने में लगे हैं। हमने प्रकृति की आहटो, संदेशों को कभी गंभीरता से नहीं लिया और खुद के सिवा किसी की परवाह नहीं की। आधुनिक तकनीक का उचित उपयोग हम कब करेंगे। मानो या न मानो इसके जिम्मेदार इस सरकार के साथ-साथ हम तुम भी हैं।
प्रेरणा : “ये हसीन वादियाँ, ये खुला आसमां, आ गए हम कहाँ …!!!”