मनमोहन ने माना "नौ सालों में ईमानदारी

मनमोहन ने माना “नौ सालों में ईमानदारी भूला”

कांग्रेस सरकार (सप्रंग -२) के नौ साल पूरे होने पर कांग्रेसी नेताओं ने उपलब्धियों का बखान किया वहीँ उसी समय विरोधी पार्टियों ने सरकार को विफल और भ्रष्ट घोषित किया। किन्तु इस बात से इनकार भी नहीं किया जा सकता कि  सरकार ने विकास की कई योजनाए बनायीं पर सरकार उसमें भ्रस्टाचार को रोकने में असफल रही या यूँ कहे भ्रस्टाचार नेताओं का जन्मसिद्ध अधिकार हैं इस से उन्हें कैसे दूर रखा जा सकता हैं? पर किसी की
जवाबदेही तो बनती ही है, सरकार चलाना कोई किराने की दूकान नहीं कि आप को उसके घाटे या मुनाफे की चिंता न हो, या जैसी चल रही हैं चलने दो। सरकार की जवाबदेही उन सभी के प्रति बनती हैं, जिन्होंने मत दे कर  चुना इस आस में कि देश सही लोगों के हाथ में हैं और तरक्की करेगा, और जो आयकर के रूप में अपनी कमाई का हिस्सा देश को समर्पित करते हैं। 


सच्चे, ईमानदार अर्थशास्त्री मनमोहन देश को अपनी ईमानदारी नहीं दिखा पाए और सरकार बचाने में इतने व्यस्थ रहे कि जनता से संवाद करना ही भूल गए। मनमोहन ने न केवल प्रधानमन्त्री पद की गरिमा को नहीं समझा अपितु देश की जनता से बात करना भी मुनासिब नहीं समझा। दागी नेता से पद त्यागने के लिए कहने के बजाय उन्होंने भ्रष्ट नेता के इस्तीफे तक स्वीकार नहीं किये। क्या मनमोहन कांग्रेस के बोझ तले इतने दबे रहे की अपनी मन की आवाज भी नहीं सुन पाए या वो सुनना ही नहीं चाहते हैं? आज मनमोहन अपने पकडे गए दागी मंत्रियों को बचाने के लिए उनके विभाग बदल देते हैं बजाय इसके कि उन पर कड़ी कार्यवाही की जाए। आपकी ईमानदारी देश को घोटालों की लड़ी दे रही हैं और आप चुप हैं। सारे घोटालों की रुपरेखा ‘प्रधानमन्त्री कार्यालय’ से ही प्रविष्ट होती हैं और एक योग्य प्रधानमंत्री को ये ज्ञात होना चाहिए कि मेरे नीचे क्या हो रहा हैं? 

मोदी आज इतने लोकप्रिय क्यों हैं इसीलिए क्योंकि वो संवाद करते हैं और न केवल विकास की बात करते हैं बल्कि कर के दिखाते हैं। कहते हैं न कि एक गलती माफ़ होती, पर मनमोहन शासन ने इतनी गलतियाँ की हैं कि क्षमा का सवाल ही उत्त्पन्न नहीं होता।
छत्तीसगढ में हुए नक्सल हमले लोकतंत्र की असफलता को दर्शाते हैं, ये पहली बार नहीं कि नक्सलियों ने हमला किया हो पर किसी सरकार ने इस मसले को जड़ से मिटाने की कोशिश नहीं की, क्या राज्य सरकार विकास के वादे को पूरा नहीं कर सकती? यदि सरकार पूरी ईमानदारी से अपना काम करे तो नक्सल जैसे दल कभी उत्पन्न ही न हो। हर नक्सल दल विकास की बात करता हैं, अपने अधिकारों की बात करता हैं, क्या सत्ता दल के बड़े-बड़े नाम इनको एक भरोसा नहीं दे सकते? लोग सरकार पर भरोसा नहीं कर रहे हैं यदि हालत नहीं सुधरे तो वो दिन दूर नहीं जब हर राज्य नक्सलवाद की समस्या से गुजरेगा और एक तरफ सरकार होंगी और दूसरी तरफ हाथो में हथियार और आँखों में क्रोध लिए आम आदमी।
यदि आप अपने काम के प्रति समर्पित हैं तो ईमानदारी खुल के खुद-ब-खुद बोलेगी। आज ईमानदारी के किस्से बस कभी कभार ही सुनाई देते हैं कि ‘फलां’ बन्दे ने पैसे से भरा बेग लौटा दिया या पैसे से भरा पर्स लौटा दिया। मैं आपको एक सच्ची घटना बताता हूँ।  
                       बात रात की हैं, करीब 2 बजे होंगे। मैं और मेरा दोस्त मोहाली बस स्टेशन पर बस का इंतज़ार कर रहे थे। हमें स्टेशन छोड़ने दोस्त का दोस्त, जो मेरा दोस्त भी बन चूका था, बाइक पर छोड़ने आया था। हमारी पहली गलती 3 लोग बाइक पर; दूसरी गलती गाड़ी के पेपर्स नहीं थे। करीब आधा घंटा प्रतिक्षा करने के बाद बस आई और मैं और मेरा दोस्त बस में बैठ गए और दोस्त का दोस्त भी अपने रूम को चला गया। कुछ समय बाद हमने बस से देखा कि दोस्त के दोस्त, को गश्त लगाने वाले पुलिस वालों ने रोक रखा था। मैं और मेरा दोस्त सोचने लगे कि आज फंसा ये तो। 2 मिनट बाद हमने उसे फ़ोन किया और पुछा क्या हुआ? ” कुछ नहीं यार, रोन्ग साइड से बाइक चला रहा था, तो उन्होंने रोक दिया, जबकि पूरी सड़के सुनसान थी। क्योंकि पेपर्स तो थे नहीं इसीलिए मैंने मामला निपटाने के लिए जेब में हाथ डाला और 200 रूपये बढा दिए, दो पुलिस वाले थे। ये देख एक पुलिसवाला बोला “जेब में रख इसे, और चल जा आगे से ध्यान रखियों।” किस्मत अच्छी थी कि पुलिसवाले ईमानदार निकले। दोनों पुलिसवाले हरयाणवी लग रहे थे, बोलने के अंदाज़ से। वो तो ठीक था हेलमेट था और आते वक्त नहीं पकड़ा वरना दो लोग पीछे बिना हेलमेट, पक्का चालान हो जाता। चल ठीक हैं टेन्शन मत लियो। बाय” 
यहाँ पुलिसवालों को पूरा मौका मिला था कि 500 रूपये कमाए जाए परन्तु पुलिसवालों ने अपने काम का दुरूपयोग नहीं किया बल्कि गलती की गंभीरता को समझते हुए एक वार्निंग देना ही उचित समझा। मैं और मेरा दोस्त इन पुलिस वालों की ईमानदारी के कायल हो चुके थे। इन्होने पुलिस वालों के बारे में मेरी धारणा कि बिना घूस कुछ नहीं करते को असत्य सिद्ध किया। कहते हैं न एक अच्छा कार्य आपका नजरिया और मन को सुकून देता हैं, जो पाप के पैसे से नहीं मिलती।
ऐसे कई लोग होंगे हमारे आस-पास जिनको रोज ‘काला धन’, जो ‘नंबर दो’ के नाम से प्रचलित हैं, ऐठने का मौका मिलता होगा पर उनका ज़मीर उन्हें इसकी इजाजत नहीं देता। यहीं वो लोग हैं जो वाकई में रियल लाइफ के हीरो हैं और समाज की बेहतरी के लिए प्रयासरत हैं। देशभक्ति की कीमत कोई ज्यादा नहीं हैं बस आपको अपना ज़मीर जिंदा रखना हैं और मन की सुननी हैं। क्या हमारे देश का प्रधानमंत्री ऐसा नहीं कर सकता? यदि नहीं तो संविधान में राजनीति का सबसे ताकतवर पद कहे जाना वाला ये पद आज बहुत कमजोर हो गया हैं और  सत्ता के लालच में देशभक्ति और ज़मीर की बलि भी दे रहा हैं !!
एक सफल नेता वो होता हैं जो हर मुद्दे पर जनता के समक्ष अपनी बात रखे, अपने शासन में हुई त्रुटियों को माने और उसको आगे से न होने देने का केवल वादा न करे बल्कि कर भी दिखाए। वो नेता योग्य हैं जो हर आदमीं के एक-एक पैसे का हिसाब जनता को दे, जो बेबाक हो और हर मामले में अपनी एक सोच रखता हो। 
मुहे तो ये लगता हैं की जो साख मनमोहन ने अपनी ईमानदारी से कमाई और इस पद तक पहुचे उसे कायम नहीं रख पाए। कहते हैं न जब तक जो दिखे न उसे मानना नहीं चाहिए। तो क्या आप पिछले 9 सालों के आधार पर मनमोहन को ईमानदार कहेंगे? नहीं , ना !!
प्रेरणा : “ईमानदारी दिखनी भी चाहिए।”