नेताओं की चर्चा स्वर्ग लोक में !!

किसी चिंता में डूबे ‘नारद’, ‘नारायण’ के पास पहुँचे और बोले “नारायण ! नारायण ! , हे प्रभु ! ये पृथ्वी में क्या हो रहा हैं? हर कोई कलयुग की कालिमा को सहजता से अपना रहा हैं? बुराई का बोलबाला हैं और नैतिकता का अंश मात्र ही शेष रह गया हैं। नारी का तो सम्मान करना ही भूल गए हैं ये लोग। आज लोग जिस थाली में खाना खाते हैं उसी में छेद कर रहे हैं (e.g. क्रिकेट-फिक्सिंग)। मुझ से भारत की ऐसी हालत नहीं देखी जाती, ज्यादा समय नहीं हुआ हैं जब इसे देवभूमि कहा जाता था। अब आप ही मेरी व्यथा को शांत करने का उपाय बताये।”
नारायण चेहरे के भाव ‘क्रोध’ को शांत करने का प्रयास करने लगे, लगा जैसे वो आज ही भारत में बसे दुष्टों का नाश करना चाहते हो। 
नारायण मंद मुस्कुराते हुए नारद के सवालों का उत्तर देने लगे “नारद! ये सत्य हैं, मानव आज अंधकार में डूबता जा रहा हैं, अगर कलयुग की शुरुवात ये हैं तो आने वाला कल कैसा होगा ? मैं कल्पना भी नहीं करना चाहता। जब अधर्म की जय जयकार  होती हैं तो लोग पैसे के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। मनुष्य आज में जीने लगे हैं, अगले जन्म और पुण्य या पाप की इन्हें चिंता कहाँ ? लेकिन ये भूल गए की समय सबसे बलवान हैं और किये गए हर कार्य का हिसाब देना ही होता हैं। ये लोग कल को बेहतर बनाना भूल गए हैं और भौतिकता की आड़ में दिखावे और क्षणिक सुख के पीछे भाग रहे हैं। आज जिनके पास पॉवर हैं, उच्च पद पर हैं; भ्रष्ट हो चूके हैं। लोग ईमानदार हैं पर उनकी कोई पूछ नहीं हैं। आने वाला समय देखो क्या क्या दिखाता हैं?”

नारद हाँ में सर हिलाते हुए बोले “तो क्यों न आप अपना अगला अवतार ‘कल्कि’ ले कर अधर्म और पापियों का नाश कर लेते? और पुनः नए सिरे से संसार की रचना करे।”
नारायण ये बात सुन गंभीर हो बोले “मैं तो तैयार हूँ पर उचित समय पर ही सब कुछ होता हैं। पाप की भी एक सीमा होती हैं उसके बाद ही उसे पूरे न्याय के साथ मिटाया जाता हैं। पर तुम इस बारे में ‘ब्रह्म देव’ से विमर्श कर सकते हो। मैं पापियों के नाश को आतुर हूँ, मानव ‘लक्ष्मी’ के पीछे भाग-भाग कर थकते नहीं, अपनी तिजोरियाँ, दीवारे, अलमारिया, बैंको को पैसे से भर कर भी ये सुखी नहीं। इनकी भूख पूरी मानवता को खा जायेगी।”
नारद जो कि ब्रह्म देव के मानस पुत्र हैं, ब्रह्म लोक पहुच गए और बोले “पिताश्री ! ये तेरे संसार की क्या हालत हो गयी हैं? नेता जिन्हें किसी विभाग का प्रबंधक कहा जा सकता हैं, कितने गिर चुके हैं ! भारत का शासक ‘मनमोहन’ की एक गलती – वो देश के प्रधानमंत्री बने, पूरी राजनीति को ले डूबेगी। हर एक देश दूसरे की सफलता देख आँखे दिखाने लगता हैं। ये शांति ज्यादा देर तक नहीं रहने वाली, एक भीषण विश्व-युद्ध के इंतज़ार में देश रास्ता देख रहे हैं।”
ब्रह्म देव शांत मन से विचार करते हुए बोले “नारद! मैं समझ गया तुम किस तरफ इशारा कर रहे हो, परन्तु समय-चक्र से छेड़कानी करना उचित नहीं। परन्तु कैसे मैं कलयुग का समय बिना त्रिदेव से विचार किये बदल सकता हूँ ?”
नारद ब्रह्म देव की मंशा समझते हुए त्रिदेव-बैठक की व्यवस्था में लग गए।

ब्रह्म, विष्णु, महेश तीनों बैठक में विराजमान थे और सभा का विषय था – “कल्कि अवतार में और कितनी देर?” ब्रह्म देव ने विषय की रुपरेखा और उसकी प्रस्तावना रखी। शिव, नारायण और ब्रह्मा  की मंशा देख बोले “जैसा आप चाह रहे हैं वो उचित नहीं हैं, जब तक अधर्म की सीमा नहीं पार होती, तब तक कैसे अधर्म का नाश किया जा सकता हैं ?”

विष्णु बीच में बोल पड़े “मगर महादेव ! आज की स्थिति को देख डर लगता हैं कि कलयुग का और विस्तार नैतिकता, नारी और धर्म की गरिमा को नष्ट न कर दे। अज्ञानता की घोर बदली ने ज्ञान को ढक रखा हैं। क्या हम पृथ्वी की हालत पर तरस नहीं खा सकते?”
शिव बोले “नहीं, नारायण! यही तो कलयुग हैं जो धर्म की, नैतिकता की परीक्षा लेता हैं, परन्तु मनुष्य इतना खुद में सिमटा रहता हैं कि मूल्यों का महत्तव भूल गया हैं। यहीं कलयुग अन्य युगों के लिए एक सबक बनेगा और कलयुग का अंत घोर विनाशक होगा। मानवो को इन मूल्यों का आभास तब होगा जब बहुत देर हो चुकी होगी। वो समय शीघ्र आएगा जब गंगा भी अपनी शीतलता त्याग देगी। मनुष्य अपने हर अनुचित किये का  स्वयं पश्चाताप करेंगे।”
नारायण : “परन्तु बीते तीन युगों के परिणामों से इन मनुष्यों ने क्या सीखा? सिखा तो बस लोगों को धर्म, जाति  के आधार पर बाँटना, नारी को एक वस्तु समझना और उसकी गरिमा को पैरो तले कुचलना, अपनी जिम्मेदारी से भागना और ईमानदारी की महत्ता को तुच्छ समझना, गलत तरीकों से धन संचय में लगे रहना, अपने और पराये की ख़ुशी की राह में रोड़ा बनना, माँ-बाप की इज्ज़त न करना; नैतिकता और सत्य की भावना में छिपे ईश्वरीय तत्व को न पहचानना। ग्रंथों को झूठी शपथ खाने के लिए प्रयोग करना। कब तक कुछ भक्तों और महानात्माओ की आड़ में दुराचारी मनुष्य ऐश करते रहेंगे?”
शिव : “बस, नारायण! मैं भी स्वयं कलयुग का अगला स्तर नहीं देखना चाहता, पर क्या विधाता के लिखे को बदलना उचित होगा? संसार के बुद्धिजीवी इस तथ्य से अवगत हैं कि कलयुग का क्या समय-चक्र हैं? इस समय-चक्र को बदल कर क्या उनके ज्ञान पर प्रश्न नहीं उठेंगे? जिस ज्ञान को  हमने इतने युगों तक सहेज कर रखा, उसे कैसे गलत सिद्ध करे? क्या पूरी मानव जाति हम पर इस कृत्य के लिए आरोप नहीं लगायेंगे? “
नारायण : “पर ऐसा करना समय की मांग हैं, ब्रह्म देव भी अपनी रजामंदी दे चुके हैं। मानव जाति का भला करना ही मेरा कार्य हैं। परन्तु ज्ञान पर प्रश्न उठना पुन: विचार का विषय हैं। ब्रह्म देव आप क्या कहेंगे इस बारे में”
ब्रह्म देव : “मैं तो लिखे को बदलने को तैयार था परन्तु ज्ञान ही जीवन का सत्य हैं और वो अंतहीन हैं। महादेव की बाते उचित हैं और हमें उचित समय का इंतज़ार करना होगा, उसी समय पर ही सब कुछ होगा”
शिव : “पर आप निश्चिन्त रहे नारायण, धर्म, सत्य ही सदैव अंत में जीतेगा। सभी पापियों का अंत निश्चित और भयावह होगा तथा आने वाले कई युगों तक शिक्षा देगा। आपके ‘कल्कि’ अवतार का साक्षी तो पूरा संसार होगा और हर युग में पूजनीय होगा। ‘कल्कि’ ज्ञान, न्याय और शक्ति का प्रतीक बनेगा। अब आप जाए और नारद को ज्यादा विचलित न होने को कहे और योगा की मदद से मन को शांत रखे।”
नारद शिव की धारणा को समझ गए और ‘नारायण! नारायण !’ कहते हुए पुन: इंद्र लोक की और चले। पर जाने से पहले वो टी. वी. को जलाना नहीं भूले क्योंकि ‘न्यूज़ चैनलों’ की ख़बरों ने नारद की शांति भंग कर उन्हें उदासी के सागर में धकेल दिया था।
पृथ्वी पर इन न्यूज़ चैनलों की तेज़ रफ़्तार से नारद अपनी कार्यक्षमता पर शक करने लगे थे। पर अब उन्हें पता हैं संसार का उसूल हैं ‘जो दिखता हैं वो बिकता हैं’, ‘मिर्च मसाला रोमांच लाता हैं’, ‘पृथ्वी की पूरी व्यवस्था भ्रष्ट हो चुकी हैं’.
पर नारद को ये सोच संतोष था कि शिव ने सबका हिसाब करने की ठानी हैं और कुछ अनुचित होगा तो उसका उसे मुल्य अवश्य चुकाना पड़ेगा। कहते हैं न देर हैं पर अंधेर नहीं !!
प्रेरणा : एक ब्रेकिंग न्यूज़ “देश को कड़ी गर्मी में ठंडा रखने के लिए ‘A.C.’।”

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