समाज को सुधारने की ज़रुरत नहीं, देश

समाज को सुधारने की ज़रुरत नहीं, देश संवर जायेगा , गर हरेक खुद को सुधारे।

रियलिटी शोज़ का शौकीन युवा फेसबुक में जिंदगी ढूढ़ रहा हैं,
राह पर तड़पते दुर्घटनाग्रस्त लोगों को देख आँखों की नमी ढूढ़ रहा हैं,
रेप, मर्डर, घोटाले की बढ़ती घटनाएं को रोकने में असफल
हर कोई समाज़ के असुरों के नाश को एक ‘हीरो’ ढूढ़ रहा हैं।।१।।
इतना सिमट गया इंसान खुद में कि महसूस करना भूल गया हैं,
ख्यालों में काट लेता हैं आधी जिन्दगीं, जिंदगी जीना भूल गया हैं,
कोई कर ही लेगा देश का उद्धार ‘मुझे क्या’ ?
सदियों से आम आदमी यही आस लिए एक ‘नेता’ ढूढ़ रहा हैं।।२।।
तेरे दर्द को बोझ मान पुलिस पड़ताल न करने का बहाना ढूढ़ रहा हैं,
घूस के लिए अपनी ताकत का अनुचित प्रयोग कर रहा हैं,
तबादलों से कुछ नहीं होना इनके दिलों में धड़कन फूंको
अपनी फ़रियाद लिए पीड़ित आज भी एक पुलिसवाला ढूढ़ रहा हैं।।३।।
दशकों से ‘चलता हैं’ रवैया देशभक्ति की लौ बूझा रहा हैं,
लक्ष्यहीन युवा पर पिशाच हावी हो इंसानियत दबा रहा हैं .
खुद की आग बनाये रखने की ज़रुरत हैं आज
मगर हर शख्स मोमबत्ती की लौ जला रहा हैं।।४।।
संवेदनहीन समाज इलाज़ को एक ‘शोर्ट-कट’ ढूढ़ रहा हैं।
तारीख पर तारीख होते देख हरेक सालों से ख़ुशी का एक पल ढूढ़ रहा हैं।
आँखें हैं सभी के पास पर कोई देखना नहीं चाहता,
हालत ये हैं ‘अंधा कानून’ आज भी एक ‘डोनर’ ढूढ़ रहा हैं।।५।।

विकृत सोच का न होगा मन पर काबू, गर धर्म-ग्रंथ का सार जीवन में उतारे।
समाज को सुधारने की ज़रुरत नहीं, देश संवर जायेगा , गर हरेक खुद को सुधारे।
किसी की मदद तो कर के देखों, आँखों से निकलते पानी की कीमत अनमोल पायेंगे।
एक कदम तो बढ़ाओ समाज की बेहतरी के लिए,
‘आई पी एल’ जैसा रोमांच नहीं, पर जिन्दगी को मायने मिल जायेंगे।।६।।

प्रेरणा : “देश की बेटी रोती हैं , हमारी पुलिस सोती हैं।।”