चुल्लूभर मूत में डूब मरो

चुल्लूभर मूत में डूब मरो

सरकारी नौकरीवाला!
जब मैं कॉलेज में था तब हम अक्सर हर विषय पे गप्पे मारा करते थे उनमें से एक था कि कॉलेज के बाद कौन-सी नौकरी करनी हैं? अधिकतर की राय थी कि जॉब तो वो सरकारी ही करेंगे। ये पूछने पर क्यों? कहते कि सरकारी नौकरी, आराम की नौकरी, कोई काम-धाम नहीं, ऊपर से ‘नम्बर दो’ की कमाई अलग। बहुत कम ऐसे थे जो कहते कि मैं देश के लिए कुछ करना चाहता हूँ, देश की नौकरशाही बिना घूस कुछ नहीं करती, मैं इस धारणा को बदलना चाहता हूँ। और  कुछ ऐसे थे जिन्हें कोर फील्ड में जाना था चाहे सरकारी या प्राइवेट और ईमानदारी के साथ काम करते हुए आगे बढना ही उनका लक्ष्य था। तो ये हैं हमारे देश का युवा और उसका सपना।
समाचारों में ऐसी खबरे आना कि फलाँ सरकारी कर्मचारी ( सी-ग्रेड ) के घर छापे में 50 करोड़ नकद मिला और लाखों की जमापूँजी बैंक में जमा हैं, इसी तथ्य को सिद्ध करती हैं कि सरकारी कार्य कैसे होता हैं और युवा सरकारी नौकरी क्यों करना चाहता हैं। ऐसा नहीं हैं कि सभी लोग ऐसे हैं कुछ चुनिंदा लोग हैं जो समाज की अच्छाई को जीवित रखे हैं और देश भक्ति को सर्वोपरि मानते हैं।
हमारे देश की स्थिति कुछ ऐसी हैं कि सबको अपने बच्चों की शिक्षा के लिए स्कूल प्राइवेट चाहिए, सबको इलाज़ के लिए अस्पताल भी प्राइवेट चाहिए पर नौकरी सरकारी ही चाहिए। ये तो ऐसी स्थिति हैं कि खुद कोई काम नहीं करना और लोगों से इच्छा करना कि काम पूरी ईमानदारी से करें। ये लोग वो नहीं जो अनपढ़ हैं ये वो हैं जो पढ़े लिखे हैं और जिनको अच्छे-बूरे की समझ हैं। ऐसी हास्यापद, गंभीर और विरोधाभास की स्थिति ही देश में सरकारी तंत्र के काम-क़ाज के तरीके पर निशाना लगाती हैं परिणामस्वरुप घोटाले, मंद विकास और देश हित की समस्या के प्रति संवेदनहीनता। युवाओं की सरकारी तंत्र के बारे में ऐसी सोच को बदलना होगा। युवाओं को खुद को बदलना होगा और देश के हित में कार्य करना होगा। हर युवा को जनता के हक़ के लिए आगे आना ही होगा, देश की समस्या को अपनी समस्या मानना होगा और उसकी बेहतरी के लिए हर उचित कदम समय-समय पर उठाना होगा।
ये देश का दुर्भाग्य ही हैं कि उप-मुख्यमंत्री पद पर काबिज़ नेता ‘अजित पवार’ ये कहता हैं कि “फलाँ बंदा हफ़्तों से पानी की माँग के लिए हड़ताल पर हैं। जब पानी हैं ही नहीं तो कहाँ से लाये, क्या मूते! .. मूतने के लिए भी तो पानी चाहिये। “ ये सुन नेता के साथी और बैठी जनता ठहाके लगाती हैं। उसी समय यदि सभा में बैठे कुछ युवा ही यदि सूखे के मुद्दे की गंभीरता को समझते हुए नेता को जूतों से पिटते तो देश को उचित सन्देश जाता। परन्तु लगता हैं कि आज का युवा देश की समस्याओं के प्रति गंभीर नहीं हैं तो कैसे उनके समाधान के लिए कुछ करेगा। देश के हर नेता की जवाबदेही बनती हैं कि हर समस्या का समाधान के लिए कार्य करे। आपके द्वारा चुने नेता अगर हर समस्या के प्रति इस तरह का रुख रखते हैं तो आप समझ सकते हैं कि हम से कितनी बड़ी गलती हुयी हैं? आज से ही हमें अपनी गलती को सुधारने की तरफ कार्य करने होंगे।
बूँद-बूँद को तरसती जनता !
महाराष्ट्र में कई गाँओं में लोग ट्रेन के बाथरूम से पानी लेकर रोजमर्रा के कार्य करने को विवश हैं। बच्चे और औरतें  ट्रेन के रूकते ही बाल्टियाँ भरने में व्यस्त हो जाते हैं और ट्रेन के गुजरने के बाद दूसरी ट्रेन के आने का इंतज़ार होता हैं। सरकार बियर, कोल्ड-ड्रींक कंपनियों को सस्ते कीमत पर पानी देती हैं पर आम जनता को फ्री में पानी देने में असमर्थ हैं। कब तक देश बारिश के भरोसे रहेगा। हर साल पानी की समस्या के निपटारे के लिए कई हज़ार करोड़ों की योजनायें बनती पर पैसा कहाँ जाता हैं ये सबको पता हैं। क्या समस्या पर चुटकी लेना और पैसा डकारने के बाद माफ़ी माँगना उचित हैं? नहीं, ऐसे व्यक्ति को जेल में डाल उसकी पूरी संपत्ति जब्त कर देनी चाहिए।
  
आज देश को ऐसे युवाओं की तलाश हैं जो धर्म के नाम पर लड़ता न हो, जात के नाम पर भेदभाव करता न हो , अपने कार्य को ही धर्म मान पूरी शिद्दत के साथ करता हो, देश के हित की बात पर सड़कों पर आन्दोलन करने से भी नहीं हिचकता हो। देश की नारी शक्ति ऐसी हो जो घरेलू हिंसा के खिलाफ लड़े, अपने अंदर पलते बेटी के भ्रूण को मरने न दे, हर क्षेत्र में पुरुष के साथ कदम बढाये, अपने हक़ को समझे, परिवार को एक सूत्र में बांधे रखे। ऐसे युवाओं वाला देश बनने की तरफ भारत कदम बढ़ा चूका हैं पर देखना ये हैं कि अभी और कितना समय बाकी हैं।
प्रेरणा : एक और सदी का बेहतरीन मज़ाक :
“हम जहाँ चाहे बारिश करवा सकते हैं।” -आसाराम बापू