चक्रवर्तिन : शासकों में महानतम और शासन में नैतिकता को बल देने वाला

प्रियदर्शी नरेश 
(मगध सम्राट अशोक की वीरता, राजनीति, शासन में नैतिकता को जीवंत करती पंक्तियाँ )

संध्या का बीभत्स दृश्य
निशा ही जैसे हो इसका उद्देश्य
व्योम की लालिमा और गहराता तम
स्तब्ध हैं नयन, स्तब्ध हर रोम
सम्राट अशोक ‘चक्रवर्तिन ‘

नभ और धराहैं एक रंग
रक्तिम सर्वस्व रक्तिम विलाप रक्तिम उमंग
संध्या नहीं ये समर का विराम है
यह सम्राट का अंतिम संग्राम है
यह रण, अभिलाषा का आखिरी चरण है
कल सन्नाटा गूंजेगा, थर्रायेगा जयजयकार
शक्ति का होगा कारूण स्वर, निर्बल टंकार
आज का चंड अशोक कल प्रियदर्शी होगा
आज महत्त्वाकांक्षी कल समदर्शी होगा
भारतवर्ष देखो मगध के इस शूर को
पाटलिपुत्र में छाया जिसका भय उस क्रूर को
देखो इतिहास के इस वीर पुत्र को
अगमकुआँ में अपने शत् भ्राताओं को
इसने सत्तालोभ में था जीवनमुक्त किया
इसने हर विद्रोह को निर्ममता से था तोड़ दिया
ना बचा कलिङ्ग में एक भी नर का शीश
पर  कलिंग बीता, कुरु अब नहीं शेष
अब अहिंसा इसकी प्रतिमा, अहिंसा इसका वेश
अहिंसा को अब अर्पित होगा हर कण
फैलेगी सम्पूर्ण सृष्टि में इसकी कान्ति
फैलेगी सकल विश्व में शान्ति
मनुष्य नहीं जीवमात्र को यहाँ न्याय का अधिकार है
पशु भी नागरिक, यह उसका भी संसार है
ब्राह्मी और खरोष्ठी से सुसज्जित स्तम्भों का निर्माण
अखंड आर्यावर्त में करवा रहा यह भूपति महान
देखो निर्माणाधीन महाबोधि को
देखो इन विहारों और स्तूपों की आभा को
साँची सारनाथ धौली लौरिया की सभा को
तेरी जीवनगाथा गंगा गाती अपने दक्षिण तीरे
वो कहती यथार्थ, पर मैं कैसे मानूं रे?
रणभूमि धर्मभूमि कूटनीति राजनीति
इतनी छवियों का तुझमें समावेश
तू विलक्षण व्यक्तित्व विशेष
कोटि प्रणाम ऐ भारतनरेश!

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