प्रतिक्रियाओं का दौर

प्रतिक्रियाओं का दौर

इतना झूठ भी न बोलो !

           देश की राजनीति भौतिकी के न्यूटन के तीसरे नियम : “क्रिया की प्रतिक्रिया” का उदाहरण हो चली हैं। हर नेता आज किसी भी विषय पर बिना सोचे अपना बेतुका बयाँ दे देता हैं, और फिर उसके विरोध और पक्ष में अनेकों प्रतिक्रियाएं आने लगती हैं। फिर मीडिया भी इन बेतुके बयानों पर पूरा दिन ब्रेकिंग न्यूज़ बना कर दिखाती हैं। क्या हमारा मीडिया मौका परस्त और पक्षपाती नहीं हो गया हैं? मीडिया भी हर नेता को पकड ये पूछती रहती हैं कि “उनका इस मामले में ये कहना हैं क्या आप सहमत हैं? आपकी क्या प्रतिक्रिया हैं?”

           कुछ सच्ची, मन में कहीं दबी, अनकही प्रतिक्रियाएं इस प्रकार हैं:

          जब जैश-ऐ-मोहम्मद जेहादी संघटन को इस बात का ज्ञान हुआ कि उनके एक पायदे अफजल गुरु, 2001 में संसद हमले का साजिश-कर्ता, को भारत ने फांसी दे दी हैं तो उनका कहना था कि “कितने अफजल, कसाब को फांसी देंगा भारत? हम कई अफजल और कसाब देते रहेंगे भारत को। वो शहीद हो गया हैं, अल्लाह उसे जन्नत दे।”  तभी किसने जैश-ऐ-मोहम्मद के मुल्ला से पूछ लिया “क्या आप धरती के स्वर्ग कश्मीर को नर्क में नहीं बदल रहे?”

        वैसे भी जिस तरह से फिल्म ‘विश्वरूपं’ पर विवाद हुआ और अफजल की फांसी पर कश्मीरी मुसलमानों द्वारा विरोध किया गया, वो बहुत कुछ सोचने पर विवश करता हैं। ये कहना गलत नहीं कि आज भारत में ही एक पाकिस्तान बसता हैं, पहले किस से निपटे ये एक गहन अध्ययन का विषय हो सकता हैं। कश्मीरी मुसलमानों का कहना हैं कि ‘अफजल ने कुछ भी अनुचित नहीं किया, वो तो इन देश के भ्रस्ट और अपराधी नेताओ को सबक सिखाने गया था।” अब उन्हें कौन समझाए कि कुछ अच्छे लोग भी संसद में बैठते हैं हम उनकी अकाल मृत्यु नहीं सह सकते।

           इसी मसले पर लश्कर-ऐ-तैयबा का कहना हैं कि “भारत कैसे फांसी दे रहा हैं, ये तो मानवाधिकार का हनन हैं। अब से हमे 18 से कम उम्र के लड़ाके ही तैयार करने होंगे। भारत आगे होने वाली घटना के लिए अब स्वयं जिम्मेदार हैं। हमने लोगो की घुसपैठ करने के लिए सीमा पर बमबारी शुरू कर दी हैं। हम अफजल और कसाब की शहादत का बदला ले के रहेंगे। भारत को अब चैन नहीं लेने देंगे। ” तभी किसने उन पर इस प्रश्न दाग दिया “क्या कभी आप चैन से अल्लाह की इबादत कर पाए हैं यदि हाँ तो उनके संदेशो को मानते क्यों नहीं?”
          जब पाकिस्तान के गृहमंत्री रहमान मलिक से पूछा गया कि “शाहरुख़ खान ने कहा कि वो भारत में पूरी तरह सुरक्षित हैं और मुझे अपनी सुरक्षा की चिंता नहीं। बाहरी लोग सलाह न दे। इस पर आप क्या कहेंगे?”
“मैंने तो वो लेख ही नहीं पड़ा, मेरे सलाहकार ने मुझे इस बारे मैं बताया था। क्या करें उसकी थोड़ी अंग्रेजी कमजोर हैं तो थोड़ी समझने में गलती हो गयी। पर इससे हमको ये फायदा हुआ कि हमने मीडिया का ध्यान युद्ध-विराम की घटनाओं से हटा दिया।” तभी किसी की नम आँखों ने पूछ लिया “कब तक आप लोग नफरत की आग जलाते रहेगे? क्यों न पाकिस्तान को पाक बनाए और गोलाबारी के जगह शिक्षा के दीप जलाये?” 
          आम पाकिस्तानी मुसलमान काफी दुखी नज़र आ रहा था, उसका कहना था कि “आज पाकिस्तानी जनता खुद को ठगा महसूस करते हैं। जिस उम्मीद से पाकिस्तान का जन्म हुआ था, उसे पाने के लिए कभी कोशिश भी नहीं की गयी। आज देश आतंक का पर्याय बन चूका हैं। काश मेरे दादा जी, बटवारे के समय भारत में ही रुके होते। पाकिस्तान का जन्म इतिहास की सबसे बड़ी गलती थी। कुछ लोगो ने अपने स्वार्थ के लिए देश को बाँट डाला। जिन लोगो के पास कोई लक्ष्य नहीं हैं उन्होंने कश्मीर को अपना मुद्दा बना लिया हैं और धर्म के नाम पर खून बहा रहे हैं। धिक्कार हें मुझे ऐसे लोगो पर, जो इस्लाम को नीचा दिखाते हैं।” 
         कश्मीर की एक घटना, लड़कियों के प्रगाश बैंड में गाने पर रोक लगाने के लिए इस्लामिक धर्म गुरुओं का उनके खिलाफ फतवा जारी करना, पर जब एक कश्मीरी लड़की से पूछा गया तो उसका कहना था “ये दुखद हैं कि बैंड में गाने वाली लडकियों ने संगीत छोड़ दिया। कब संगीत गाना इस्लाम में हराम हो गया? रफ़ी, आतिफ असलम , अदनान सामी, नुसरत फ़तेह अली खान आदि को इन्होने क्यों नहीं रोका? क्या लडको के लिए इस्लाम की परिभाषा अलग हैं और लड़कियों के लिए अलग। इन लड़कियों को गाना गाने से रोकने के लिए इन लोगो ने न केवल बलात्कार की धमकी दी बल्कि उनके परिवार के कत्लेआम करने का भी फरमान दिया। क्या लोगों का कत्लेआम, लडकियों को नापाक करना इस्लाम में हराम नहीं? धर्माधिकारी क्यों धर्म की आड़ ले के अपने हित साधने की असफल कोशिश करते हैं।” तभी भीड़ में से किसी ने अपना दर्द यूँ बयां किया “आज हम टीवी नहीं देख सकते, लड़कियों को शिक्षा नहीं दे सकते, कोई भी बाज़ार में देर तक रुकने से डरता हैं इस डर से कि कंही कोई ब्लास्ट न हो जाए। ऐसा लगता हैं की हम नर्क में ही रहते हैं।”
अन्याय के खिलाफ बोलो !!

          अगर आज पाकिस्तान और भारत में समझोता हो जाए कि भारत के मुसलमान पाकिस्तान बस सकते हैं और पाकिस्तान में रह रहे कुछ हिन्दू भारत में तो शायद ही भारत का कोई भी मुसलमान पाकिस्तान में रहना चाहेगा। ये कैसी धर्म शिक्षा जो मर्द जात की जननी को आजादी नहीं देता? ये कैसा धर्म जो बेवजह निर्दोषों के खून की प्यास के लिए आतंकवाद को जेहाद का नाम दे? ये कैसे धर्माधिकारी जो रब से नहीं डरते, सिर्फ डरने का ढोंग करते हैं? याद रखे धर्म कभी आपस में बैर करना नहीं सिखाता, केवल कुछ कट्टरवादी लोग उनका अपने मतलब के लिए गलत अर्थ निकालते हैं। आप में खुद एक दिव्य शक्ति वास करती हैं क्यों न मन को शांत रख आत्म विवेचना करे। अधर्मियों की बातों में न आकर अपने विवेक से काम करे। अपने परिवार, अपने देश, अपने कल के लिए आज से ही सत्य के, अहिंसा के, न्याय के, धर्म के, मानवता के पथ पर चले। क्यों छोटी सी जिंदगी को और छोटी करें, जियो और जीने दो।

 
       मेरी इस क्रिया पर कैसी प्रतिक्रिया आती हैं, ये देखना बाकी हैं?
प्रेरणा : न्यूटन का तीसरा नियम : क्रिया की प्रतिक्रिया .