आतंकवाद के धर्म की खोज

                 कहा जाता हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। परन्तु पिछले दिनों हुई दो घटनाये इस बात का विरोध करती हैं। पहला वाक्यां R.S.S. को हिंदू आतंकवादी गुट बताना और दूसरा विश्वरूप पर विवाद। ये आश्चर्यजनक और दुखद हैं कि वोटों को खीचने के लिए ऐसे अशोभनीय मामले आते रहते हैं और हम लोग उसमे बह कर धर्म को रक्तरंजित करने से भी नहीं चूकते।
बोलने से पहले सोचो!!
                 गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे का कहना हैं कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ हिन्दु आतंकवाद फैलाता हैं। वो सत्तारूढ़ पार्टी के सदस्य हैं, यदि ऐसा हैं तो वो सबूतों के साथ ऐसे संगठन को प्रतिबंधित क्यों नहीं करते? ऐसे आरोप की राजनीति से उनको क्या मिलेगा? महज़ बिना आधार आरोप लगाना सही नहीं हैं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर नेता आरोप लगाते रहे हैं बस इसीलिए कि वो अखंड भारत की बात करता हैं, हिन्दू एकता की बात करता हैं। जब भी हिन्दुओं की बात आती हैं लोग खुद को ठाकुर, राजपूत, पंडित, बनिए, दलित इत्यादि में बाटने लगते हैं। तो ऐसे दौर में  राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसे हिन्दू संगठनो की ज़रूरत बहुत आवश्यक हैं। नेहरू भी संघ के शिवरों में जाते रहते थे, तो क्या हम ये माने की नेहरु भी एक आतंकवादी संगठन के सदस्य थे? यदि ऐसा हैं तो क्यों इतने सालो से लोग संघ से जुड़ रहे हैं क्या देश की 50 % जनता आतंकवादी हैं? R.S.S. विश्व का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संस्थान हैं। संघ किसी भी धर्म की बुराई करना नहीं सिखाता न ही लोगों को बांटता हैं वो तो सिर्फ देश की अखंडता की बात करता हैं। मुझे आश्चर्य होता हैं कि लोग आतंकवाद को धर्म से जोड़ रहे हैं।
वोट बैंक के लिए हर बेबुनियाद मांग जायज!!
               विश्वरूप पर हुआ विवाद महज़ एक तुच्छ राजनीति भर  हैं। भारत के मुसलमानों को इस बात की परेशानी हैं कि अफगानिस्तान के मुसलमानों को बम धमाके करने से पहले कुरान पढते दिखाया गया हैं। ये विवाद मुसलमानों की एकता का एक नमूना भर हैं; किसी भी मुसलमान को ये गवारा नहीं की किसी भी देश के मुसलमान को स्क्रीन पर गलत कार्य करते हुए दिखाया जाए। ये इस्लाम धर्म की विशेषता हैं जो अलग-अलग देशों में रह रहे मुसलमानों को जोड़े रखती हैं। यदि आज हिन्दू इससे प्रेरणा ले सके तो विवाद की महत्ता और बढ जायेगी।अगर आप कई पुरानी फिल्मो को देखेंगे तो पायेंगे कि इन फिल्मो में गुंडे काली की पूजा करते हैं, तो क्या सभी हिन्दुओं को इन फिल्मो के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए थी? क्या ऐसी कट्टरता हमारे देश के अमन के लिए घातक नहीं? क्या ये सर्वविदित नहीं कि अफगानिस्तान में इस्लाम के नाम पर जेहादी गतिविधियाँ होती हैं? फ़िल्में यथार्थवादी बनती रही हैं जो कि एक साहसिक कृत हैं, अगर संसार में जैसा होता हैं वैसा दिखाया जाता हैं तो उसमे बुरा क्या हैं? देश को आज सबसे बड़ा खतरा कुछ भ्रस्ट नेताओ और धार्मिक नेताओ से हैं। ये लोग अपने स्वार्थ के लिए जनता को भड़काते हैं और फिर बाँटते हैं। जब सेंसर बोर्ड एक फिल्म पास कर चुका हो, तो उस पर धर्म या राजनीति के नाम पर रोक लगाना गलत हैं। ऐसे में सेंसर बोर्ड की ज़रूरत ही क्या हैं, वो समय दूर नहीं जब फिल्म रिलीज़ करने से पहले अलग-अलग धर्मों के लोगो को दिखानी पड़े और इसमे कोई शक नहीं कि ढाई घंटे की फ़िल्म 2 घंटे की हो जायेगी? वैसे भी जनता मनोरंजन के लिए फिल्मे देखती हैं न कि धर्म की शिक्षा लेने के लिए। अगर फिल्म पसंद न आये तो लोग बस यही कहते हैं यार पैसा व्यर्थ गया, कुछ मज़ा नहीं आया। इसीलिए ये विवाद महज़ वोट बैंक की राजनीति हैं और इससे सबसे ज्यादा नुकसान एक मुसलमान को ही होता हैं।
              क्यों हम उन लोगो पर बेन नहीं लगाते जो लोगो को धर्म के नाम पर बाँटते हैं? क्यों हम उन लोगो पर बेन नहीं लगाते जो घोटाले कर जनता का पैसा लूटते हैं? तब कहाँ चले जाते हैं वो नेता, वो दल जो एक फिल्म या एक कार्टून या किताब से डरते हैं पर जब कोई लाइव प्रदर्शन कर विघटनकारी बाते करता हैं और देश की अखंडता पर प्रहार करता हैं? आज देश में इस्लाम को वोट बैंक के लिए इस्तेमाल किया जा रहा हैं। हिन्दुओं को वोट बैंक में बाँटने के लिए जाति ही काफी हैं। वर्तमान में धर्म आम आदमी को या तो बेबस बनाता हैं या फिर आतंकवादी? लोग धर्म की मूल भावना को भूल चुके है।
              अगर आप किसी फ़िल्म या किताब का विरोध करना चाहते हैं तो फिल्म न देख के कर सकते हो या किताब न खरीद कर कर सकते हो ना कि ज़बरदस्ती लोगो को रोक कर। ऐसे कृत्य कलाकार को हत्तोत्साहित करते हैं और अभिव्यक्ति की आजादी का क़त्ल करते हैं।आज देश की जनता इतनी जागरूक हैं कि वो धर्म, जाति और राज्यों के नाम पर आसानी से एक-दूसरे को मारने को तैयार हैं। क्या हमे ऐसी ही जागरूकता चाहिए? आज सरकार वोटों के लिए कुछ मुट्ठी भर लोगों के विरोध के चलते उनकी नाजायज मांग मानने को विवश हैं? क्या सरकार उनके इस तुच्छ मांग को दबा नहीं सकती थी? इसके विपरीत सरकार जनलोकपाल के लिए लाखों लोगों को अनसुना कर देती हैं और न्याय की मांग करने वालों पर लाठियाँ मारती हैं।
जागो भारत! जैसे आप, वैसा आपका देश।।
प्रेरणा: आतंकवाद की प्यास लहू … क्रोध की उपज, बमों की कहूँ।।

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