शायद इस नए साल में, दर्द जरा कम हो जाए

बोझल जिस्त वही फिरसे,
वही इंतज़ार कीघड़ियाँ फिर,
पर शायद इसनए साल में,
दर्द जरा कमहो जाए।

माजी की रेशमयादो पे,
रूखे याद कीकड़ियाँ फिर,
पर शायद इसनए साल में,
दर्द जरा कमहो जाए।

बुझे आँख केटूटे सपने,
दिल में बसेबेशक्ल ख्वाब,
खुद से खुदकी अजब जंगमें,
लड़ते मरते बेबसहम।

ग़म की कालीरातों में,
बुझीबुझी फुलझड़ियाँफिर,
पर शायद इसनए साल में,
दर्द जरा कमहो जाए।

गर्दू भी हैखफाखफा,
रहजररहबर कीखबर नही,
खता हुयी कीचाहत की,
और सबको दुश्मनबना लिया।

मुंसिफ कातिल साथसाथहैं,
हांथो में हथकड़ियाँफिर,
पर शायद इसनए साल में,
दर्द जरा कमहो जाए।

– अभिषेक कुमार पाठक 

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