ये कैसा संविधान हैं ?

ये कैसा संविधान हैं ?

        आज फिर स्कूलों के छात्र-छात्रायें हाथो में तिरंगे ले के “वंदेमातरम!!!”…”भारत माता की जय!!”…”26 जनवरी अमर रहे!!”…”देश की रक्षा कौन करेगा ? …हम करेंगे, हम करेंगे !! कैसे करोगे ?.. तन से करेंगे, मन से करेंगे, धन से करेंगे” जैसे नारे लगाते हुए पंक्तिबद्ध हो गलियों से गुजरेंगे। फिर स्कूलों में सांस्कृतिक, देश-भक्ति से परिपूर्ण कार्यक्रम होंगे। स्कूलों के प्रधानाचार्य और विशेष मेहमान ( कोई नेता या सरकारी अधिकारी ) गणतंत्र दिवस के इतिहास, उसकी महत्ता और संविधान पर प्रकाश डालेंगे।
               नेता जो मुख्य अतिथि हैं कुछ यूँ कहेंगे- “भारत एक संसदीय लोकतांत्रिक गणराज्य हैं जो संविधान द्वारा शासित हैं। इसीलिए देश के शासन का आधार संविधान ही हैं या दूसरे शब्दों में संविधान ही भारतीय राजनीति का अन्य नाम हैं। 26 जनवरी,1950 को इसे लागू किया गया। इसी कारण 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हैं। ये संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान हैं। इसका मूल मंत्र हैं देश का कोई भी व्यक्ति देश का शासन चला सकता हैं और न्यायपालिका सर्वोपरी हैं। ये जनता का शासन हैं।”
            काश तभी एक छात्रा खड़ी हो विशेष मेहमान से ये प्रश्न करती – “ये कैसा गणतंत्र हैं जहाँ देश की जनता, दिल्ली बलात्कार मुद्दे पर राष्ट्रपति को अपना दुःख बताने जाती हैं तो उसे पीटा जाता हैं, न्याय की मांग करती हैं तो कड़ाके की सर्दी में, तेज पानी की धार डाली जाती हैं, जब देश का युवा अपने घर से अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए एकत्र होने जाते है तो मेट्रो और कई मार्ग बंद कर दिए जाते हैं?(रेपिस्ट को माफ़ी, संसद में सभी दागी) सरकार जनता को  उनकी मांग के लिए शांति से अनशन भी नहीं करने देती। गुंडे-बाहुबली पुलिस से नहीं डरते और जब कोई पीड़ित मदद और अपने हक के लिए उनके पास जाती हैं तो पुलिस टालमटोल रवैया अपनाती हैं। क्यों न्याय मिलने में सदिया बीत जाती हैं। क्यों माँ आज अपने लाड की शहादत पर रोती हैं (अमन की आशा थोड़ी थमेगी, तेरे खून पर बातचीत फिर से चलेगी) ? क्यों आज कोई अपनी बात स्वतंत्र रूप से नहीं रख सकता (जेल में सच्चाई, संसद में पोर्न की रंगाई) ? इसके विपरीत विघटनकारी लोग कुछ भी अनुचित बोल सकते हैं। क्यों आज एक बिहारी, मुंबई में जाके नहीं रह सकता (देश की खंडता, तू वोट बैंक बड़ा? कैसे आज एक शिक्षक जो घुस दे के नौकरी लेता हैं, युवाओं की जड़ मज़बूत रख पायेगा (टीचर घोटाला, तेरी तो चौटाला )?” 
              विशेष मेहमान कुछ सोच में पड गए, शायद उनको चिंता हो रही थी कि आज बच्चे काफी जागरूक हो गए हैं, अब बिना विकास वोट नहीं मिलेंगे, पैसो से वोट नहीं खरीद पायेंगे। नेता के जवाब की देश की शांति के लिए ये सभी कदम जायज थे पर छात्र भड़क गए और छात्रा ने अपनी सेंडल दे मारी। नेता जी ‘मुर्दाबाद’ के नारे गूँज उठे और उनके अंगरक्षक को उनको ले जाना पडा। काश ऐसा हो पाता।
              मेहमान के जाने के बाद प्रधानाचार्य  ने छात्रों को समझाते हुए कहाँ “बीती घटनाये गणतंत्र के सिद्धांतो पर प्रहार के तुल्य थी। सरकार ने इन सभी मामलो की जांच की हैं और जो दोषी थे उनको तलब किया। शिक्षा, मताधिकार और अपने अधिकारों के लिए लड़ना ये 3 आधार हैं जो गणतन्त्र को जीवित रखेंगे। जिस देश में अहिंसा का अपना सुनहरा इतिहास रहा हैं आज वहां हिंसा और भ्रस्टाचार लोकतंत्र का चेहरा हैं।”

              तभी एक छात्र पूछता हैं- “ये कैसा संविधान हैं देश का? कि अपराधी को वाह-वाही मिलती हैं और जो सत्य के लिए लड़ते हैं वो अकेले रह जाते हैं। ये कैसा संविधान हैं जो लोगो को, समाज को आरक्षण नीति से बाँटता हैं ? ये कैसा संविधान हैं जो काफी व्याप्त हैं पर कोई भी बात या तथ्य स्पष्ट नहीं हैं? आज कोई कैसे उपकार की सोचे, जबकि सभी स्वार्थ और धन-संचय में लगे हुए हैं?”
             प्रधानाचार्य अपनी बात यूँ रखते हैं ” कोई भी चीज परफेक्ट नहीं होती। संविधान में भी काफी सुधार की ज़रुरत हैं, ताकि कानून की कमियों को मिटाया जा सके। संविधान एक ‘सोना‘ हैं, लेकिन इन नेताओं ने इसे पुन: ‘कोयले‘ में बदल दिया हैं। बीते युगों में भी कई लोगों जैसे कंस, रावण इत्यादि ने वरदान पाए, पर उनका क्या हश्र हुआ ये सबको ज्ञात हैं। ऐसा इसलिए कि उनका उद्द्येश्य उचित नहीं था, वो केवल अपने स्वार्थ के लिए शक्ति को पाना चाहते थे न की सत्य और धर्म के मार्ग पर चल समाज में ज्ञान फैलाने के लिए। इससे पता चलता हैं कि अमुल्य वस्तु पा लेने से कुछ नहीं होता, जब तक कि आपकी मंशा और आपका उद्देश्य उचित नहीं हैं। आज यही हालत भारत की हैं, जिसके पास एक ऐसा संविधान हैं, जो कई देशो के संविधान की अच्छी बातों को ले के बनाया गया, पर क्या हम कभी उन देशो से आगे निकल पाए? ऐसा इसीलिए कि आज का उम्मीदवार इस सोच के साथ चुनाव लड़ता हैं कि काफ़ी ‘नंबर दो’ की कमाई होती हैं और सरकार की शक्ति, न्याय पर पकड का होना सोने पे सुहागा। आज चाह कर भी जनता ‘जन लोकपाल अधियेक‘ पास नहीं करा पाती, तो कैसे ये जनता का शासन हुआ। आज कब जनता की मांग ये सरकार सुनती हैं, ऊपर से उस पर महंगाई की बाढ़ देती हैं। क्यों सरकार भ्रष्ट नेता की सम्पति जब्त नहीं करती हैं? क्यों कुछ सालों की सजा के बाद उसे पवित्र मान लिया जाता हैं? आज की स्थिति को कोई बदल सकता तो वो हो आप लोग, आज का युवा, आने वाला भविष्य। तुम ही इस व्यवस्था की कमियों को मिटा सकते हो, अपनी शिक्षा, अपने कर्तव्यो और देश-भक्ति के दम पर।”
       देश का संविधान जनता और सरकार के मध्य विश्वास पैदा करने का माध्यम होता हैं। पर आज स्थिति पूरी विपरीत हैं जनता आज किसी भी पार्टी और सरकार पे भरोसा नहीं कर पाती। मुझे डर हैं कि गणतन्त्र दिवस केवल पुस्कारों को बांटने और सेना, सशस्त्र बलों की प्रदर्शनी बन कर न रह जाए। देश की अखंडता और एकता का प्रतीक गणतन्त्र का उत्साह क्या हमारी सोच को बदल पायेगा? क्या एक दिन का गर्व पर्व इन भ्रस्टाचारियों, इन अपराधियों को बदल पायेगा? क्या गणतंत्र का मतलब हम जान पाए हैं? कब हर एक नागरिक अपने कर्तव्य, अपने अधिकारों को जानेगा। एक आन्दोलन की आवश्यकता हैं। एक जागरूकता की आवश्यकता हैं। संविधान में कितने भी संशोधन करा लिए जाए, जब तक हम-आप नहीं बदलेंगे तब तक वहीँ ढाक के तीन पात


प्रेरणा : मेरा भारत महान; 100 में से 90 बेईमान !!