फांसी से पहले बलात्कारी के अंतिम शब्द

क्या मेरी फांसी से तेरी सोच बदलेगी?

चरित्र में रफू” ( Mending Character)

हर नारी को देख होंठ सीटी बजाते हैं
मेरी अशुद्ध परवरिश छिछोरीबाज़ी कराते हैं
न जाने क्यों तेरी अकड़ को सबक सिखाने का मन करता हैं
आज आईने में खुद को देख डर लगता हैं
मास्टर जी! क्या चरित्र में रफू लगता हैं।।

स्कर्ट वाली हो या साडी वाली शरीर मैं करंट लगाती हैं
आँखे फिर एक्सरे मशीन बन जाती हैं
समाज की दकियानुसी सोच मर्द के मन में अहंकार भरता हैं
आज स्वार्थी समाज में जीने से डर लगता हैं

समाज की सीख 

मास्टर जी! क्या चरित्र में रफू लगता हैं।।

माँ बेटे के प्यार में क्यों भूल जाती वो हैं एक नारी 
काश! मेरी पहली गलती का सबक सजा दे कर सिखाती
क्यों मेरे संस्कारो की नीव कच्ची हैं? गिरने का डर लगता हैं
आज सभी के विचारों में खुद को बदलने के सिवा समाज की संवेदनहीनता का तमगा हैं
मास्टर जी! क्या चरित्र में रफू लगता हैं।।

काश! महिलाओ की सफलता से मैं न जलता
केवल वासनापूर्ति का साधन न समझता
क्या राखी की कच्ची डोर चीर-हरण को बढते हाथो को रोक सकता हैं ?
आज गंगाजल कामुकता की आग बुझाने में असमर्थ लगता हैं 
मास्टर जी! क्या चरित्र में रफू लगता हैं।।

दुराचारी को आजादी, पीड़ित को सजा, बलात्कारी को संसद में सम्मान मेरा होसला बढाती हैं
बुराई का बोलबाला, पैसे का मुह पर ताला, जनता का अत्याचार के खिलाफ ख़ामोशी मुझे आसुरी कृत्य करने को कहती हैं
देखना हैं कब तक मानवता की सोच मेरे अन्दर छिपे दस्यु को दबाकर रखता हैं ?
आज क्यों फिर ऐसा कुकृत्य करने का मन करता हैं?
मास्टर जी! क्या चरित्र में रफू लगता हैं।।

नारी की सुन्दरता, उसकी स्वतंत्रता, उसकी अदा का सम्मान करना सिखाना होगा
समाज में फैले लड़का-लड़की के भेदभाव को मिटाना होगा
रावण से बुरा बन चूका मर्द, रावण से शिक्षा लेने का मन करता हैं
आज वीर पुत्रो को जन्म देने वाली, बुराई का नाश करने वाली देवी की गाथाओ पे हर कोई शक करता हैं
मास्टर जी! क्या चरित्र में रफू लगता हैं।।

प्रेरणा : मैं तो सुधर गया, तुम कब खुद को बदलोगे?

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