विकास पर राजनीति क्यों नहीं ? जाति पर

विकास पर राजनीति क्यों नहीं ? जाति पर ही क्यों ?

        दो दोस्त रमेश और सुरेश इंजीनियरिंग या मेडिकल प्रवेश-परीक्षा की तैयारी करते हैं और दोनों एक ही कॉलेज में एडमिशन लेते हैं। रमेश 104 अंक पा कर और सुरेश 301 अंक  पा कर, और ये मुमकिन हुआ “प्रवेश-परीक्षा में आरक्षण बिल” की नीति के तहत। कॉलेज में “पढाई में आरक्षण बिल” के तहत रमेश को हर सेमेस्टर में 4 विषय पढ़ने होते हैं और सुरेश को सभी 5 विषय। लेकिन दोनों की दोस्ती पर आरक्षण की राजनीति का कोई फ़र्क नहीं पड़ा। दोनों दोस्त कॉलेज पास कर के एक ही कंपनी में सेलेक्ट हुए। कंपनी सरकारी थी और उन्हें “रिक्त-पदों की भर्ती में आरक्षण बिल” के तहत 5 सामान्य जाति के और 3 दलित जाति के लोगो को सेलेक्ट करना था। कम्पनी ने 10 दलित छात्रों का बिना किसी तर्क परीक्षा के उनका इंटरव्यू लिया और सामान्य जाति के 50 छात्रों में से 10 छात्र इंटरव्यू लेने के लिए चुनने के लिए तर्क परीक्षा ली।

         2 साल तक कंपनी में सुरेश काफी मेहनत से कार्य करता हैं और उसे प्रमोशन नहीं मिलता हैं। “प्रमोशन में आरक्षण बिल” के तहत रमेश को प्रमोशन मिलता हैं। अगले एक महीने बाद, सुरेश अमेरीका में नौकरी पा लेता हैं और कंपनी के साथ-साथ देश छोड़ कर चला जाता हैं। वहाँ वो अपनी मेहनत के अनुसार प्रमोशन पाता हैं और खूब मन लगा कर काम करता हैं। आज तक सुरेश लौट कर भारत नहीं आया।

        आप ही बताइये क्या “प्रमोशन में आरक्षण बिल” ला कर हम भारत देश की होनहार सामान्य वर्ग की जनता को विदेश में जा बसने के लिए मजबूर नहीं कर रहे। बसपा जाति के आधार पर राजनीति करती रही हैं, और अब वो “प्रमोशन में आरक्षण बिल” को पास करा, उ.प्र. में फिर से अपनी सरकार लाने का दावँ खेल रही हैं। क्यों 15% लोगो के हित के लिए 85% लोगो की जिंदगी से खिलवाड़ किया जा रहा हैं?
           प्रमोशन में आरक्षण बिल के अनुसार सरकारी कंपनी में पदोन्नति में दलितों को 5% आरक्षण मिलेगा।इस बिल पर उत्तर-प्रदेश में छिड़ी सपा और बसपा की लड़ाई जग-जाहिर हैं। उ.प्र. में  लाखों सरकारी कर्मचारी इस बिल के विरोध में अनिश्चितकालीन हड़ताल पर चले गए हैं।

           मैं बसपा और हर एक उस राजनीतिक दल के नेता से पूछना चाहूँगा कि पहले तो आप प्रवेश-परीक्षा में आरक्षण द्वारा, दलित मंद्बुद्दी छात्रों को  देश के प्रतिष्ठित कॉलेजों में प्रवेश दिलाते हो, इस तरह उस प्रतिष्ठित कॉलेज के स्तर को गिराते हो। क्यों आप दलित को मेहनत कर प्रवेश हासिल करने का ज़ज्बा देते ? और जब वो किसी कंपनी में काम करने लगता हैं क्यों प्रमोशन में आरक्षण बिल ला कर उसे आपाहिज़ कर रहे हो, क्यों उसे अपनी क्षमता दिखाने का मौका देने देते? क्यों आप दलित को दलित ही रहने देना चाहते हो ? सिर्फ इसीलिए कि आपकी सत्ता की भूख को दलितों की वोट रूपी रोटी मिलती रहे। अगर आप देश में अमीर और गरीब के बीच की खायी पाटना चाहते हैं तो प्रमोशन में आरक्षण बिल उसे और गहरा कर देगा। 

               किसी भी संस्थान में पदोन्नति योग्यता के आधार पे होनी चाहिए न कि जाति के आधार पर। यदि आप किसी अयोग्य व्यक्ति को जाति के बल पर प्रमोशन देते हो, वो उस पद की गरिमा नहीं रख पायेगा और तो और इस निर्णय से योग्य व्यक्ति की कार्य-क्षमता प्रभावित होगी और संस्थान का माहौल बिगड़ेगा और इस तरह दिए गए कार्य में विफल होगा। परिणाम स्वरुप उस संस्थान को हानि उठानी पड़ सकती हैं। इससे अप्रत्क्षय रूप से देश के विकास की गति प्रभावित होगी। यदि ये बिल पारित होता हैं तो सामान्य वर्ग का छात्र सरकारी नौकरी का ख्वाब छोड़ देगा और हर सरकारी संस्थान में उच्च पदों पर केवल दलित वर्ग के लोग ही काबिज़ होंगे। क्या  प्रमोशन में आरक्षण मिलना मानवाधिकार का हनन नहीं हैं? सरकार और बसपा के मध्य डील हो चुकी हैं कि आप एफ.डी.आई. का समर्थन करो फिर हम  प्रमोशन में आरक्षण बिल का समर्थन करेंगे।
             क्यों आज राजनीति देश को एक धागे में बाधने के लिए नहीं हो रही? क्यों विकास को वोटो का आधार नहीं बनाया जाता हैं ? क्यों जाति बताकर आप दलितों को उनके दलित होने का अहसास कराते हो ? राजनीतिक दल समाज में बराबरी की राजनीति क्यों नहीं कर रहे? वोट बैंक की घटिया राजनीति के लिए आज हर दल नए-नए आरक्षण की योजनाए बना रहा हैं? आज कोई दल दलितों के नाम पर आरक्षण की बात कर रहा हैं तो कोई मुसलमानों को आरक्षण देने की वकालत कर रहा हैं। जो लोग मुसलमानों को आरक्षण की बात करते हैं, वो क्यों सिख,जैन,बुद्ध,पारसियों को आरक्षण देने पर राज़ी होते हैं ? भारत विश्व का एकमात्र ऐसा देश हैं जहाँ किसी भी मुस्लिम देश से ज्यादा मुसलमान हैं। अगर 20 करोड़ की आबादी वाले मुसलमान अल्पसंख्यक हैं,तो मात्र 1 लाख आबादी वाले पारसी समुदाय अल्पसंख्यक में क्यों नहीं गिने जाते? ये तथ्य दिखाते हैं कि एक बड़े वोट बैंक को हासिल करने के लिए राजनीतिक दल आरक्षण जैसे मुद्दे को उठाते रहे हैं। वो सदैव एक ही खेल खेलते रहे हैं – बाँटो और राज करो। और इस तरह आरक्षण देश में साम्प्रदायिक शांति को भंग करने में अपना योगदान देता रहा हैं।

         पिछले महीने ही सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर-प्रदेश की सरकारी नौकरियों में दलित वर्ग को पदोन्नति में आरक्षण को गैरकानूनी बता कर खारिज़ किया था। तो फिर क्यों बसपा और सरकार (सप्रंग-2) इसे पारित करने पे आमादा हैं?
           
          मैं इस बिल का विरोध करता हूँ, और आप ?

प्रेरणा: रमेश तेरी तो निकल पड़ी !!