अभिलाषा

अभिलाषा

अभी तिमिर छा रहा है
प्रकाश दूर जा रहा है
भय का अंधकार आ रहा है
सब का तन-मन है प्यासा
दिख रही किरण की आशा
सर्वचित्त ने यही है चाहा
बोल रहे सब एक ही भाषा
पूरी हो हमारी अभिलाषा।।
क्षोभ-अश्रु बह चुके
अत्याचार बहुत सह चुके
लहू लोहा लेने चल पड़े हैं
कदम भी बेड़ियों से लड़ पड़े हैं
नया दौर आ गया है आज
लौट आया हमारा सरताज
बोल रहे सब एक ही भाषा
पूरी होगी हमारी अभिलाषा।।
हो गया दीप प्रज्वलित
सत्य हुआ सब को विदित
प्रतिशोध की क्रांति आ चुकी है
प्रतिद्वंदियों पर हमारी वीरता छा चुकी है
और हो गया विजय का रास
हो गयी निराशा भी निराश
बोल रहे सब एक ही भाषा
पूरी हो रही हमारी अभिलाषा।।
विस्मित है खुद विस्मय भी
मिल गया सुरों को लय भी
जब छेड़ दी हमने तान
लौट आया हमारा सम्मान
टूट गया सारा मज़ाज
रच दिया इतिहास आज
बोल पड़े सब एक ही भाषा
आखिर पूरी हुई हमारी अभिलाषा।।