जूता है की मानता नही

जूता है की मानता नही

हिंदी में जूता , अंग्रेजी में शूज़ , पंजाबी में ਸ਼ੂਜ਼ (जुत्त ) , जापानी में दोसोकू , संस्कृत में पादुका ! अरे नहीं ! मैं आपको जूता के विभिन्न भाषाओँ में नाम नहीं बता रहा हूँ ! मैं तो आपका ध्यान जूते की महिमा की तरफ ले जाना चाह रहा हूँ ! इसकी महिमा अमेरिका से लेकर भारत तक कितनी फैली हुई है , यही बताने की कोशिश करी है अपने इस लेख में !
  
भारतीय फिल्मों के महान शोमैन राज कपूर ने जूते को समर्पित एक गाना गाकर भी इसकी महिमा को और भी बढाया है ! मेरा जूता है जापानी …..अब ये शोध का विषय हो सकता है कि उन्होंने ये जूता सच में जापान से मंगवाकर ही पहना था या मुंबई के भिवंडी बाज़ार के टिंडे वाली गली की राम स्वरुप की दूकान से तब के ज़माने में आठ आने में लेकर आये थे ! ये सवाल दिग्विजय सिंह जी के लिए छोड़ देते हैं कि वो इस पर रणधीर कपूर या ऋषि कपूर को अपनी प्रश्नावली भेजें !

जूते की बात चल रही है तो सीरिया के लेखक , साहित्यकार श्री खलील जिब्रान की एक कहानी याद आ रही है ! जिब्रान साब रेगिस्तान में नंगे पाँव चले जा रहे थे , ऊपर से तेज़ धूप और नीचे से तपती रेगिस्तान की ज़मीन ! भगवान् को कोसते हुए , एक एक कदम बढाए चले जा रहे थे ! थोडा आगे निकले होंगे कि क्या देखते हैं – एक बुजुर्गवार , जिनके पैर नहीं हैं , बड़े मस्त, हाथों को ज़मीन पर टिकाये चले आ रहे हैं ! उस बुजुर्गवार को देखकर खलील जिब्रान साब ने वहीँ अपने दोनो हाथ उठाकर ऊपर वाले का शुक्रिया किया , या अल्लाह ! मुझ पर तेरी बड़ी महर है ! तूने मुझे कम से कम दो पैर तो दिए ! जूते नहीं तो कोई बात नहीं !

जूते की बात कभी कभी मन को बड़ी प्रसन्नता देती हैं ! जब छोटा था , तब की एक घटना याद आती है ! हमारे गाँव में एक नवयुवक की शादी थी ! बरात कहीं दूर जानी थी ! उस वक्त बारात 2-3 दिन रूकती थी ! उस बारात में नए लड़के भी थे जो पूरी मस्ती में थे ! गर्मी का समय था , वहीँ जहां बारात रुकी हुयी थी , पानी पीने के लिए बड़ा सा ड्रम रख दिया गया था ! उन्हें पता नहीं रात को सोते समय क्या सूझी – उन्होंने सभी के जूते एक एक करके उस ड्रम में डाल दिए ! पूरी रात बाराती वोही पानी पीते रहे और सुबह तक वो ड्रम तो खाली हो गया लेकिन बारातियों के जूते फूल गए ! बाराती बिगड़ गए और उन्होंने वहीँ के गाँव वालों पर अपना गुस्सा निकाल दिया ! दूल्हा पिट -पिटा के बिना दुल्हन के वापस लौट आया !

आप देखेंगे -कहीं अगर हल्की फुल्की पड़ोसियों की लड़ाई बज जाए तो भाई लोग कभी ये नहीं कहेंगे कि लड़ाई हो रही है , ये कहेंगे -जूता चल रहा है ! कोई बाप , अपने बेटे को पीट दे तो दोस्त लोग कहेंगे – कल तो उस पर , उसके बाप ने जूता बजा दिया या कहेंगे जूता फेर दिया ! कभी कभी एक और शब्द सुनने को मिल जाता है – अरे , कल तो उधर जूतम पैजार हो रही थी ! मैंने बहुत कोशिश करी की देखूं – ये जूतम पैजार किस भाषा का शब्द है , लेकिन मुझे नहीं मिला !

मंदिर -मस्जिद या अन्य पूजा स्थलों के बाहर स्पष्ट लिखा होता है -कृपया जूते बाहर ही उतारें ! इससे दो काम सिद्ध हो जाते हैं ! मंदिर या पूजा स्थल की गरिमा बनी रहती है , साफ़ सफाई भी ! दूसरा – वो जो बाहर इसी ताक में सुबह से खड़े हैं कि कब कोई बढ़िया सा जूता ( जोड़ा ) मिले और ले चलें अपने थैले में ! उसका भी काम आसान ! कभी कभी ऐसा भी हुआ है कि हबड़ दबड़ में एक ही जूता उठा पाए तो फिर सारी महनत बेकार !

हिन्दुओं के शादी विवाह में तो जूता अपना एक विशेष ही महत्व रखता है ! शादी हो गयी , फेरे भी हो लिए ! लेकिन अभी एक रस्म बाकी है ! जूता चुराने की ! साली या सालियाँ ( जैसा जिसका भाग्य ) आएँगी , वो कह के आपका जूता चुराएँगी ! आपका ही जूता , आप ही पैसे दो , तब जाकर वापस मिलेगा ! क्या व्यवस्था है ! जूता भी मेरे , सर भी मेरा ! लेकिन साब परंपरा है ! अच्छा लगता है ! आप ये भी देखिये की उस वक्त आपके साथ बहुमत नहीं होगा ! बहुमत होगा आपकी सालियों के साथ ! और तो और आपकी अभी अभी हुई नयी नवेली दुल्हन भी आपसे कहेगी – जितना छोटी कह रही है दे दीजिये न ! आहा हा !अब तो आप भी कुछ नहीं कर सकते ! जितना माँगा है , देना हो पड़ेगा ! आप भी तो साली साहिबा को खुश देखना चाह रहे हैं ! उसने प्यार से मुस्करा के एक बार जो बोल दिया -दीजिये न डिअर जीजू ! आप तो अपनी पॉकेट खाली कर दोगे ! गलत कह रहा हूँ तो कह दो सही कह रहा हूँ ?

तो साब अब भी आप कहेंगे कि जूता कोई मायने नहीं रखता ? इसी जूते ने तो अच्छे अच्छों की इज्ज़त को उतार के रख दिया ! ये कुछ घटनाएं आपको इस बात का प्रमाण देंगी !


  • 14 दिसंबर 2008 को ईराक में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जोर्ज बुश पर भरी सभा में जब जूता फैंका गया तब से इसकी महत्ता और भी ज्यादा बढ़ गयी है !
  • अमेरिका की ही पूर्व विदेश मंत्री कोंडालिजा राइज़ को कुंडारा कहा जाने लगा था जिसका मतलब होता है जूता !
  • 2 फरवरी 2009 को चीन के प्रधानमंत्री वेन जिआबाओ पर केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में भाषण देते समय एक जर्मन ने जूता फैंका !
  • 7 अप्रैल 2009 को भारत के तत्कालीन गृह मंत्री पी . चिदंबरम पर दैनिक जागरण के पत्रकार जरनैल सिंह ने प्रेस कोंफ्रेंस में जगदीश टायटलर को सी .बी,आई द्वारा क्लीन चिट दिए जाने पर जूता फैंका !
  • 16 अप्रैल 2009 को भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवानी पर कटनी में जूता फैका गया !
  • 18 अक्टूबर 2011 को लखनऊ में अरविन्द केजरीवाल पर जूता फैंका गया और दोबारा ये घटना फरुक्खाबाद में दोहराई गयी जब भारत वर्ष के दामाद श्री रॉबर्ट वाड्रा के भाड़े के टट्टू ने अरविन्द पर जूता फैंकने की कोशिश करी और उसे लोगों न्र धुन दिया !



ये बहुत सी घटनाओं में से कुछ बड़े लेवल की घटनाएं हैं जो ये सिद्ध करती हैं कि जूता कोई आम चीज नहीं है !

ये जूता ही था जिसको हैदराबाद से लेने के लिए मायावती का एक स्पेशल हेलीकाप्टर एक ऑफिसर और दो सुरक्षा गार्ड के साथ लखनऊ से उड़ान भरता था ! ये जूता ही था , जिसके शौक और शान की वज़ह से तमिलनाडु में तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता और उसकी सखी को सत्ता से उखाड़ फैंका था !

जूता आपकी शान और आपकी औकात बताता है ! कोई 5000 हज़ार का जूता पहनता है , कोई 500 का ! कोई आदिदास का पहनता है कोई कालिदास का ! पहले लोग जूती पहनते थे अब जूती का लिंग परिवर्तन करके जूता कर दिया गया है !

जूते में सत्ता और सिंहासन चलाने की ताकत भी होती है ! भगवान् राम के वनवास के समय में उनके भ्राता श्री भरत ने उनके जूतों (पादुकाएं ) के बल पर ही चौदह वर्ष राज्य को संभाल लिया ! क्या बात है ! दिग्विजय सिंह को सवाल उठाना चाहिए कि कहीं उन जूतों में भगवान् राम ने कोई C programming तो नहीं की हुई थी जिससे भरत को दिशा निर्देश मिलता रहे ? आज की अगर बात होती तो न भगवान् के जूते मिल पाते और न ही उनका राज्य !

भारत में जूतों का प्रचलन
भारत में जूतों का प्रचलन आदिकाल से है ! ऋग्वेद , युजुर्वेद में लिखे गए सूत्रों में इस बात का जिक्र है कि पुराने समय में लोग घास , लकड़ी और चमड़े से बने जूते पहनते थे जिन्हें उपनाह कहते थे ! इसका सबूत आज भी ब्रज भाषा में देखने को मिलता है जहां वृद्ध लोग आज भी जूतों को “पनाह” कहते हैं जो उपनाह का ही अपभ्रंश लगता है ! भगवान् राम के समय में अयोध्या और लंका दोनो में पादुकाएं प्रचलित थीं ! उस समय रावण के पास पादुकाएं और छाता दोनो ही वस्तुएं उपलब्ध थीं !

आपको यह जानकार आश्चर्य होगा की आज के समय में भी भगवान् राम की पादुकाओं की पूजा रामेश्वरम (तमिलनाडु ) और रामटेक (महाराष्ट्र ) के मंदिरों में की जाती है !
दक्षिण भारत के चेंचारिमाली में भगवान् सुब्रमन्य (मुरुगन या कार्तिकेय ) के लिए भक्त लोग चमड़े के बने जूते लेकर जाते हैं ! ऐसा माना जाता है कि भगवान् सुब्रमन्य चमड़े के ही जूते पहनते हैं !
महाराष्ट्र के पंधारपुर मंदिर में आयोजित होने वाले विठोबा महोत्सव में भक्तजन अपने हाथ में संत तुकाराम और संत ध्यानेश्वर की पादुकाएं छंदी के बॉक्स में लेकर चले हैं !

तो , मित्रो इससे पहले कि पढने वाले मुझे गाली देने लगें और जूता उठा लें , मैं एक आखिरी वाक्य के साथ अपनी बात ख़त्म करता हूँ !

रहिमन जूता राखिये कांखन बगल दबाय
न जाने किस मोड़ पर भ्रष्ट नेता मिल जाय !!