क्या करना है??

क्या करना है??

ज़िन्दगी किसी की गुलाम  नहीं ,
अगर तेरा खुद का कोई मुकाम नहीं ,
अरे! मर-मर कर तो हर कोई जी  लेता है,
दम तो उसमें है, जो हर गम पी लेता है।।

डर-डर के जीते हैं हम रोज़ इस कदर,
जी के देख तू एक दिन बिल्कुल बेफिक्र ,
हर कदम पर ज़िन्दगी लेगी तेरा इम्तिहान,
तो क्या रोएगा तू हर पल बस इस डरसे कि न निकले तेरी जान ?? 
रोज़ चढ़ता है तुझे किसी नयी चीज़ का बुखार,
कोई दो मीठी बात क्या करले, होने लगता है तुझे उससे प्यार,
दो आंसू कोई बहाले सामने,
तू लगा अपने दिल को थामने।।
आज का चौकीदार भी नाम को सलाम  मारता है ,
पीछे से तुझे भी गालियाँ देकर ही  पुकारता है।।
क्या किसी भी चीज़ को तू असल में महत्त्व दे पाया है??
जिसने की हसकर बात उस में राम न समाया है!

कभी माता-पिता  से ऊपर किसी को रखता नहीं ,
और जब जीवन साथी मिले तो फ़र्ज़ अपना भी दिखता नहीं,
तड़पता है तू अपनों से बिछुड़ने के गम में ,
जब रहता है मस्त तू आज-कल “दम” में।।

तेरी ज़िन्दगी को जी ले तू खुद आज ,
सोच तू है कौन ,भूल जा काम-काज ,
अपने जीवन में तू कुछ  ऐसा काम कर,के खुद पर गर्व कर पाए,
के कल को चाह कर भी इतिहास के पन्नो से नाम तेरा ना हटा पाए।।
क्या कभी सोचा भी है तूने , क्या करना है ??
रेंग-रेंग के जीना भी क्या कोई जीना है !!