एक बहस Oh My God!

एक बहस Oh My God!

कॉलेज के ग्रुप-डिस्कशन प्रतियोगिता का दृश्य :

विषय : फिल्म ‘सन ऑफ सरदार‘ का धर्म-अधिकारियों द्वारा विरोध उचित या अनुचित ?

वसीम अली : मुझे लगता हैं फ़िल्में समाज का आईना होती हैं और इस तरह फिल्मों का विरोध कर हम उनके अभिव्यक्ति के अधिकार को छीन रहे हैं। हमें फिल्म में दिखाए गए तथ्यों को ज्यादा गंभीरता से नहीं लेना चाहिए क्योंकि ये एक मनोरंजन का साधन हैं और हमे उसी नजरिये से देखना चाहिए।

हरजिंदर : नहीं, जब कोई अपनी सीमओं को लांगता हैं तो हमे उसे उसकी गलतियों को बताना चाहिए। अगर कोई फिल्म-दृश्य किसी धर्म की बुराई करता हैं, या किसी तथ्य का विरोध करता हैं या परिहास बनाता हैं, तो हमे इसके बारे में उचित व्यक्ति से बात कर मामला सुलझा लेना चाहिए, इस तरह हम लोगो की भावनाओ को आहत होने से रोक सकते हैं। अब ‘खिलाड़ी 786‘ को ही ले, ‘786’ का इस्लाम में बहुत सम्मान किया जाता हैं और देश की कुछ  इस्लामिक संस्थाएं इसका विरोध करने की सोच रही हैं।

अब्दुल : अरे, ‘इस्लामिक न्यूमरोलोजी’ इल्म द्वारा बिस्मिल्लाह हीर रहीम रहमान नीर रहीम” का गणितीय मान “786” बताया गया हैं। हरेक मुसलमान प्रत्येक छंद से पहले  “बिस्मिल्लाह हीर रहीम रहमान नीर रहीम” का उच्चारण करते हैं। इसका मतलब “सबसे दयालु और परोपकारी अल्लाह के नाम पे ..” होता हैं। इसकी महत्ता को समझते हुए मुस्लिम संस्थाओ ने ज़रूर फिल्म ‘खिलाड़ी 786’ की टीम से बात करनी चाहिए और अगर कुछ अनुचित हुआ तो उसका विरोध किया जाना चाहिए।

हिमांशु : पर भगवान भी तो एक खिलाड़ी ही हैं तो “खिलाड़ी 786” का विरोध की योजना बनाना बिल्कुल गलत हैं। अब कहा भी जाता हैं नाम में क्या रखा हैं? हमे बिना फिल्म देखे किसी निष्कर्ष पर नहीं आना चाहिए।

वसीम अली : पर ‘कुरान’ में कंही भी ‘786’ का वर्णन नहीं हैं। कुरान किसी भी तरह की  न्यूमरोलोजी का विरोध करता हैं। यहाँ तक इस तरह के कृत्यों को हराम कहा गया हैं। अल्लाह का किसी अंक में निरूपण गलत हैं। धर्म-गुरूओ को ज़रूर इसके खिलाफ फतवा जारी करना चाहिए ना कि ‘खिलाड़ी 786’ पर।

रोहित : अक्षय ने कुछ न कुछ सोच इस फिल्म का नाम ‘खिलाड़ी 786’ रखा हैं नहीं तो वो ‘खिलाड़ी नंबर 1’ रख सकते थे। आजकल अक्षय धर्म पर आधारित फिल्मे कर रहे हैं, हो भी क्यों न “OMG” हिट रही हैं और लोगो को काफी पसंद आई। मुझे लगता हैं ‘खिलाडी 786’ यक़ीनन इस्लाम धर्म पर आधारित हो सकती हैं। पर जब तक फिल्म रिलीज़ न हो कैसे पता चले ? एक मात्र उपाय बचा- फिल्म का विरोध किया जाए।

राज : विरोध उचित हैं। फिल्म “खिलाड़ी 786” का गीत ‘हुक्का बार‘ बार( शराब-घर) का प्रोहत्साहन करता हैं और इस तरह बार-गर्ल्स को सहयोग देता हैं जो बिल्कुल समाज के आईने में पत्थर मारने के समान हैं। मराठा शेर सो चूका नहीं तो इसका विरोध अभी जोरो पे होता, पर शोक की इस घडी में इस प्रकार के बेबुनियाद गीत रेडियो पे न बजते! (कई दर्शक हुक्का-बार गीत गुनगुनाने लग गए)

आयोजक (विवाद को विषय से हटते हुए देख और दर्शको की उबासी देख, निष्कर्ष निकालने हेतु आयोजक विवाद में कूद पड़े) :  बस, ‘786’ तो मेरा लकी नंबर हैं। पर कैसे ये धर्म से जुड़ा हैं ?इसकी जानकारी तो मुझे भी नहीं वरन इस विवाद का निष्कर्ष अभी निकाल देता। मैं इस्लामिक धर्म-गुरुओ से  इस पर प्रकाश डालने के लिए अगले विवाद समारोह पर आमंत्रित करूँगा। धर्म लोगो को एक दिशा देता हैं, कैसे जीवन का मूल लक्ष्य प्राप्त करे? कैसे सामाजिक, मानवीय मूल्यों के साथ जीवन-कर्तव्यों का निर्वाह करे ? पर कुछ लोग धर्म की सही परिभाषा नहीं बताते, वो इसे एक धंधे के रूप में उसका दुरूपयोग करते हैं? धर्म सिखाता हैं कि कैसे गरिमा के साथ लोग जीये? क्या जीवन-मूल्य हैं ? कैसे चरित्र-निर्माण करे? इत्यादि। पर क्या हम धर्म को कभी समझ पाए? हर धर्म एक ही बात कहता हैं क्या वो हम सुन पाए? भारत जैसे धर्म-प्रधान देश में, जहाँ ज्ञान का सागर हर धर्म के संदेशो में निहित हैं वहां धर्म का काफी दुरूपयोग होता रहा हैं। लोग आपस में धर्म के नाम पे लड़ते हैं, मरते हैं, जो किसी कलंक से कम नहीं। मैं हर धर्म का सम्मान करता हूँ और इस तरह सबसे प्राचीन धर्म “मानवता” को मानता हूँ।।

प्रेरणा : हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई….., मराठी-भोजपुरी-पहाड़ी-गुज्जू-हैदराबादी….. ।।