राजनीति: एक गंगा जो गन्दी हो चली

राजनीति: एक गंगा जो गन्दी हो चली

                             ‘राजनीति’ एक सम्पूर्ण व्यवस्था हैं जिसका मूल ध्येय लोकहित होता हैं और जिसकी सफलता जनता की खुशहाली पर निर्भर करती हैं। राजनीति में जनता एक सेवक का चुनाव करती हे ऐसा सेवक (आज नेता कहलाते है) , जो जनता की हर समस्या से परिचित हो , उसके और जनता के मध्य कोई राज न हो। पारदर्शिता इस व्यवस्था का एक मूल अंग होता हैं। जब शासक अपने सहयोगियों के हर कार्य और राज से परिचित होता हैं तो वो सफल रहता हैं।  2-G घोटाला इसका प्रमाण हैं की प्रधानमंत्री को उन गतिविधियों की जानकारी नहीं रही जो उनके मंत्रीगण अंजाम देते रहे।

                             आज के नेताओ के लिए राजनीति का मतलब चुनाव जीत कर सत्ता की कुर्सी तक पहुँचाना हैं और फिर 5 सालों तक जितना हो सके जनता के पैसे से अपना हित करना हैं। आज के नेता सेवक नहीं शक्ति में मदहोश अकुशल राजा बन गए हैं, जो अपना कर्तव्य भूल चुके हैं।

                            आज ज़रूरत हैं की देश की युवा पीढी राजनीति में आये और राजनीति के मूल मंत्र लोकहित  को ध्यान में रख देश हित में अहम् योगदान दे।

                            आज अगर एक ईमानदार युवा चुनाव लड़ने के लिए उठता हैं तो उसको हार मिलती हैं। जनता उसको वोट नहीं देती क्योंकि उसके पास वोट खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं, क्योंकि उसके पास आपको पिलाने के लिए मदिरा नहीं हैं, क्योंकि वो आप की जात का नहीं हैं, क्योंकि वो किसी बड़ी पार्टी का नहीं हैं, न जाने ऐसे कई कारण जो देशहित से बड़े हैं। ऐसा केवल बड़े स्तर के चुनावों में ही नहीं  बल्कि ‘गाँवों के प्रधान के चुनाव’ की भी यही हालत हैं। जब एक नेता चुनाव जीतने के लिए इतना कुछ करता हैं यानि के करोडों रूपये खर्चा कर आपका वोट आपसे खरीदता हैं तो उसको ये अधिकार हैं की वो अपना खर्चा किया पैसा वसूले, दूसरे शब्दों में करोडो के घोटाले करे। जनता ने ही इस तरह घोटाले करने का अधिकार नेताओ को दिया हैं। तभी आज एक मंत्री कहता हैं  “71 लाख रूपये मंत्रियो के लिए बहुत छोटी रकम है, 71 करोड़ होती तो हम गंभीर होते। “

                           आज का युवा कहता हैं “मैं वोट ही नहीं देता सभी भ्रष्ट हैं”, ये तो और भी शर्मनाक बात हुयी। क्योंकि आपने ही इस तरह भ्रस्टाचार की शुरुवात की और अपने देश के प्रति संवेदनहीनता प्रदर्शित की। जब एक कर्मचारी घूस दे कर नौकरी लेता हैं तो वो उसकी मजबूरी होती हैं की वो भी घूस ले कर जनता का काम करे और अपना क़र्ज़ चुकाए परन्तु जब क़र्ज़ पूरा हो जाता हैं तो ये एक आदत बन जाती हैं। राजनीति का दरुपयोग ही उसकी गन्दगी हैं।
                       
                        आज हममें देशहित की भावना न जाने कहाँ खो गयी हैं? सुधार की ज़रूरत ग्राम पंचायत में या सरकार की व्यवस्था में नहीं बल्कि आम लोगो की सोच में हैं। जब लोग देशहित में सोचेंगे, वोट को अपनी इज्ज़त समझेंगे, व्यवस्था की कमजोर कड़ी को सशक्त बनायेंगे  तो में सोचता हूँ तब  राजनीति का उज्जवल भोर होगा। किसी भी नियम या व्यवस्था आप और हम मैं हैं, हम लोग ही सबसे कमजोर कड़ी हैं और हमे एकजुट हो इससे शक्ति प्रदान करनी चाहिए।

                         आज देश की हालत देख एक चुटकिला सार्थक सा लगता हैं –
बेटा अपने बाप से : “ये राजनीति क्या होती हैं ?”
बाप : “बेटा, मान लो तेरी मम्मी घर चलती हैं तो वो सरकार हुयी, मैं कमाता हूँ तो कर्मचारी हुआ, कामवाली काम करती हैं तो वो मजदूर हुई, तुम देश की जनता हो और तुम्हारा छोटा भाई देश का भविष्य …
बेटा : “अब मुझे राजनीति समझ आ गयी पापा। कल रात मैंने देखा कर्मचारी मजदूर के साथ मज़े ले रहा था, सरकार सो रही थी, जनता की किसी को फ़िक्र नहीं थी, और देश का भविष्य रो रहा था …।।”

                        मैं ये कह सकता हूँ की आज की राजनीति को गंदा करने मैं जनता का अहम् योगदान रहा। अन्ना कहते हैं “राजनीति की गन्दगी मैं हम नहीं जायेंगे” पर वो भूल रहे हैं की नफरत गन्दगी से करनी चाहिए गंदे लोगों  (नेता) से नहीं। और ऐसा बोल कर क्या वो ईमानदार युवाओ को राजनीती में जाने से नहीं रोक रहे ?

                     जब आज हम गंगा की गन्दगी नहीं हटा पा रहे हैं तो क्या राजनीति की गंदगी भी ….?