मैं मलाला हूँ !

  “मैं मलाला हूँ !!”, “मैं मलाला हूँ !! ….
                    ये नारे पाकिस्तान की सड़को पे स्कूली लड़कियां पूरे जोश और साहस के साथ लगा रही हैं। अब उनके समर्थन में भारत की ही नहीं अपितु पूरे विश्व की लडकियां आ गयी हैं। सभी मलाला, जो ज़िन्दगी और मौत के बीच लड़ रही हैं, की सलामती के लिए दुवायें मांग रहे हैं।

                    मलाला युसुफजई एक साहसी, हक़ के लिए लड़ने वाली 14 वर्षीय पाकिस्तानी बालिका हैं। वो मिंगोरा, स्वात में रहती हें। तालिबान ने स्वात को 2007 से अपने कब्ज़े में ले लिया था। तालिबानियों ने स्वात में लडकियों के  स्कूल बंद कर दिए, सबके संगीत सुनने पर पाबन्दी लगा दी, बच्चो को सड़को पर खेलने से रोका गया और तो और टीवी देखने पर भी पाबन्दी लगा दी। ऐसे माहौल में जब सभी दहशत के साए में साँसे ले रहे थे, धीरे-धीरे मलाल की मिशाल जल रही थी। मलाला ने 11 वर्ष की उम्र से ही बीबीसी  के लिए डायरी लिखनी प्रारंभ की जिसमे उन्होंने तहरीक-ए-तालिबान शासन के अत्याचारों के खिलाफ़ आवाज बुलंद की और अपने कलम से तलवार का काम करने लगी। वो तब ‘गुल मकई’ नाम से लिखती थी, ताकि तालिबान की कुकृत्य नज़रो से बचा जा सके। गुल मकई तब स्वात के लोगो की एक आशा की किरण बनी, लोग तालिबान के खिलाफ आवाज उठाने लगे। जब स्वात में तालिबान का आतंक कम हुआ तो मलाला की पहचान दुनिया के सामने आई। तालिबानियों ने उसको कई बार धमकियां दी, फिर भी लडकियों की शिक्षा और महिलाओ के हक की लड़ाई उसने नहीं छोड़ी। 9 अक्टूबर 2012 मिंगोरा में स्कूल से लौटती मलाला पर आतंकियों ने हमला कर दिया। तहरीक-ए-तालिबान ने इस हमले ही जिम्मेदारी ली हैं। अभी मलाला की हालत में सुधार आया हैं।

                      तहरीक-ए-तालिबान का कहना हें की मलाला ने संघठन के खिलाफ आवाज उठाई और अमेरिकी  राष्ट्रपति   बराक ओबामा की तारीफ़ की। उन्होंने दुश्मनों के लिए जासूसी की और इस्लाम में इसकी सजा मौत हैं।

                      पाकिस्तान ने तालिबान के इस कृत्य की निंदा की और इसे ‘गैर-इस्लामिक’ करार दिया। उन्होंने फतवा जारी कर “निंदा-दिवस” मनाया और मलाला के समर्थन में आवाज बुलंद की। इसे पकिस्तान में एक परिवर्तन की किरण के तौर पर देखा जा सकता हे।आज सारे संघटन, सारा संसार मलाला के साथ खडा हैं और तालिबान की घोर निंदा हो रही हैं।

                                   बुराई के खिलाफ आवाज उठाने के लिए ‘एक’ काफी हैं।
                                   तू आगे बढता रह, साथ देने को अनेक राही हैं ।।
                                   तेरा एक कदम अत्याचार के खिलाफ मिसाल बनेगी ।
                                   जब तू चुप होगी, करोड़ो की आवाज बनेगी ।।

                      मलाला, तेरी हिम्मत को हम सलाम करते हैं। काश हर देश, राज्य, गाँव में ऐसी एक नहीं अनेको मलाला हो जो बुराई के खिलाफ आवाज उठाये। और अपने अधिकारों के लिए लड़े। यकीन हें, महिलाओ के लिए मलाला एक प्रेरणा की स्रोत बनेगी।आज हमें ‘मलाला’ ही नहीं ‘मलाल’ की भी ज़रूरत हैं।
                                       
                     जब 11 साल की लड़की अपने हक के लिए लड़ सकती हैं तो हम -आप क्यों नहीं ?

                      मलाला की डायरी के कुछ अंश  ( स्रोत : बीबीसी ) :
रात भर तोप की गोलीबारी का शोर होता रहा और मैं तीन बार उठी……….”

चूंकि आज स्कूल का आखिरी दिन है इसलिए मैंने और मेरी सहेलियों ने कुछ और देर खेलने का फ़ैसला किया.

मुझे यक़ीन है कि एक दिन स्कूल दोबारा खुलेगा लेकिन घर वापस जाते समय मैं स्कूल की इमारत को ऐसे निहार रही थी कि शायद अब मैं यहां फिर कभी न आ पाऊं….|”
 “तालिबान लड़कियों के चेहरे पर तेज़ाब फेंक सकते हैं या उनका अपहरण कर सकते हैं, इसलिए उस वक्त हम कुछ लड़कियां वर्दी की जगह सादे कपड़ों में स्कूल जाती थीं ताकि लगे कि हम छात्र नहीं हैं. अपनी किताबें हम शॉल में छुपा लेते थे.”
 “मैंने ऐसे देश का सपना देखा है जहां शिक्षा सर्वोपरि हो.”

प्रेरणा : मलाला ।।

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